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बुधवार, 12 जनवरी 2011

मेरा विभाग ही मेरी साधना है, मेरे छात्र ही मेरा पुरस्कार हैं- प्रोफेसर तोत्तोशी चाबा

शागी पेतैर द्वारा लिया गया साक्षात्कार


प्रोफेसर चाबा तोतोशि आजकल सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उनके पास महाकृति, लेटिन मॉन्दॉतन (लेटिन वाक्य संरचना)  को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय है। यह पुस्तक धीरे-धीरे आकार ग्रहण करती जा रही है। वे अपने लिए तो अपने लिए वरन् छात्रों के लिए भी नित्य बड़ी-बडी कसौटियाँ रखते थे। कोई उनसे प्यार किया करता था तो कोई नफरत, पर यह निश्चित है उनके प्रभाव से बच नहीं पाया। उनके अध्ययन के आभामंडल के तेज से बच पाना असंभव ही था।


प्रोफेसर तोतोशि को  गत वर्ष भारत सरकार की संस्था राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान की ओर से उनकी संस्कृत  कार्यसिद्धि पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की गई। इस अवसर पर उनका साक्षात्कार पढ़ सकते हैं। प्रोफेसर तोतोशि के लंबे जीवन और सक्रिय कार्यकाल में विश्व, विश्व में समाज पूरी तरह से बदल गया है और वे आपने जीवन में भी बड़े परिवर्तन के साक्षी रहे। परिवर्तन तथा विकास के। उनकी गति अटूट रही और अपनी योजनाएँ यथेच्छ पूरी कर सके। अध्यापन में लेटिन और यूनानी के क्षेत्र से संस्कृत तक चले आए। हंगरी में भारतविद्या के अध्ययन-अध्यापन की जनक और स्थापक माना जा सकता है। उनकी आपबीती सुनाने का तरीका कुछ ऐसा था कि मुझे ऐसा लगा यह भी शुकसप्तति जैसी एक विविधतापूर्ण कहानी है जो मेरी आँखों के सामने साकार हो  रही है।

पेतैर शागि– हंगरी के वैज्ञानिक समाज में आपका जीवन अनूठा है। पिछली प्रणाली में अनेकानेक अल्पज्ञानी  पर महत्त्वाकांक्षी लोग उच्‍च पदों पर आसीन तथा अकादमीय सदस्यता हासिल करते दिखाई पड़ रहे हैं, आपका इस बारे में क्या नज़रिया है, सोच है?
प्रोफेसर तोत्तोशी चाबा–मैं तब मात्र ग्यारह साल का था, जब मैंने अध्यापक बनने का निश्चय किया था और बारह का, जब मैंने विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनने का। मुझे एक पारिवारिक दोस्त की बात ने बहुत ज्यादा उत्तेजित किया था: विश्वविद्यालय में अध्यापक वह नहीं पढ़ाते जो पाठपुस्तकों में लिखा होता है, बल्कि वह जो उनके अपने चिंतन का परिपाक होता है। मेरे पिता ने इस पद को पाने का रास्ता दिखाया, साथ यह भी कहा कि यह एक महान चीज़ है, इससे और भी बड़े पद की कल्पना करना भी मुश्किल है। इस कारण मैं अधिक महत्त्वाकांक्षी नहीं था, और अपना यह लक्ष्य पा लेने के कारण पूरी तरह से संतुष्ट हूँ।
पे.शा.– ऐसे में आपको ज्यादा अहम क्या लगता था- अपने शोध का परिणाम पढ़ाना या किसी को अधिक बुद्धिमान बनाना?
प्रो. तोतोशि–किसी को बुद्धिमान बनाना। मैं इसलिए कभी भी नहीं पढ़ाता कि अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करूँ। मेरे छोटे भाई को उसका गणित का अध्यापक उत्तीर्ण नहीं करना चाहता था। तब मैं उसे सुकरात (सोक्रातीस) की प्रश्नात्मक पद्धति से सिखाने लगा, और उसके सहारे विद्यालय की ७वीं कक्षा तक वह प्रथम श्रेणी का हो गया। मेरा काम इतना ही था मैं प्रश्न पूछूँ और उसे हल खोजने दूँ।
पे.शा.– तो क्या भाई के अलावा औरों को भी पढ़ाना भी जल्दी ही आवश्यक हो गया?
प्रो. तोतोशि–मेरे पिता विद्यालय में हंगेरियन, जर्मन तथा इतिहास पढ़ाते थे। वे 1943 में सेवानिवृत्त हो चुके थे जब उनका स्वर्गवास हुआ। कहा जा सकता है कि अच्छा हुआ, वरना साम्यवादी प्रणाली में उनको जहर के घूँट पीने पड़े होते। 1918-19 की वामपंथी टकराव के दौरान भी उन्हें निलंबित किया गया था। हमारा वंश ऊँची जात का है, भले ही गरीब हो गया था। पुराने दस्तावेज़ो में 1335 से ही एक दुर्गाध्यक्ष तोतोशि का ज़िक्र प्राप्त है। मेरे पुण्य पिताजी कहा करते थे कि उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई होती, यदि उनके गाँव में एक यहूदी न होते, जो दस मोहरें देने के लिए तैयार हो गए थे। इसके नाते ही वे अध्यापक बन सके। यह पद उस समय बढ़िया आजीविका जुटाता था। हमारे पास दो हवेलियाँ थीं और बालातोन झील के किनारे एक आरामघर। हमारी ५ कमरों वाली मुख्य हवेली के साथ, निजी पुस्तकालय भी 9 फरवरी 1945 को, जर्मन फौज़ के आक्रमण के आखिरी दिन भस्म भर रह गई । पिताजी ने कहा था कि मर्द कभी डरता नहीं है। इस वजह से उस दिन भी मेरे दिल में भय नहीं था। मेरी उम्र तेरह साल थी फिर भी  मैं जलते हुए मकान से बंदूकों की गोलियों की बौछार में सबसे पहले भाई को बगल में लिए सड़क पार करके दूसरे घर में शरण लेने पहुँच गया।
1945 में जब घर और आरामघर के सरकारीकरण हो गया, माताजी का विधवादेय भी रद्द कर दिया गया, तब से  परिवार के गुजारे के लिए मुझे पैसे कमाने पड़े। लेटिन सिखाने लगा, उस दौर में अंतिम ऐस्तैर्हाज़ि के  राजकुमार का अध्यापक मैं ही था। भले ही बाद में माताजी को नए सिरे से पैसे मिलने लगे, पर मैं आजीवन उन्हें अपने वेतन का आधा हिस्सा देता रहा।
पे.शा.– आप प्रत्येक विषय में प्रतिभाशाली थे, अंततः लेटिन व यूनानी क्यों प्रधान हुईं।
प्रो. तोतोशि–कामयाबी, मैं ऐसा समझदार बच्‍चा था जो नीति के अनुकूल चलता है। पिता से सीखा था कि जिसकी अंतरात्मा पवित्र हो, वह शांति से सो सकता है। इसलिए में आराम से सोता था और अभी भी सोता हूँ। जब दादीजी दशादेश समझाती थीं। वहाँ तक आ पहुँचे कि चोरी करना अपराध है, तो उन्होंने कहा कि इसका विस्तार करना व्यर्थ है, क्योंकि हमारे परिवार में ऐसा हो ही नहीं सकता। मुझे छलना भी नहीं आता, मेरी रुचि केवल श्रेष्ठ समाधान में है। जैसे मेरे लिए मन में गिनना शौक-सा था। एक बार जब मैंने कक्षा में सब से पहले उत्तर दे दिया, पट्ट पर उससे अलग परिणाम लिखा गया। सब हँसने लगे, लेकिन मैं अड़ गया, जानता था कि मेरा उत्तर सही है। अंत में साबित भी हो गया कि सारी क्लॉस ही नहीं अध्यापक भी गलत थे। पर तारीफ़ कभी किसी ने नहीं की, यह तारीफ़ ही एकमात्र ऐसी चीज़ है जो मेरी जिंदगी से ग़ायब है। लेकिन लेटिन क्यों? तेरह साल का था जब लेटिन अध्यापक ने कहा, प्रशासक चाहते हैं कि लेटिन सिर्फ माध्यमिक स्कूल की उच्‍च कक्षाओं में पढ़ाई जाए। सुनते ही मुझे गुस्सा आया, 1945 में भी मेरी प्राथमिकता थी कि हमारी पुरानी, परंपरागत लेटिन- तथा यूनानीनिष्ठ संस्कृति जीवित होती जाए। कई साल बाद प्रोफेसर त्रैंचेञि-वल्दप्फ़ैल ने मुझे लेटिन-यूनानी प्रचारिणी समितियों का सचिव बनाया और 1990-1992 में नई प्रणाली चालू और मजबूत होने, तथा खतरा खत्म होने तक मैं इनमें काम करता रहा।
पे.शा.– आप विश्वविद्यालय में उस समय पढ़ते थे जब विद्या से जाति को ज्यादा अहमीयत देते थे। उस बेहाली से भी आपको कुछ नुकसान हुआ?
प्रो. तोतोशि–1949 में सरकार ९० प्रतिशत दाखिला किसान-मजदूर संतानों को देने में व्यस्त थी। कोई भी यह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं था कि मेरे नाम की वर्तनी द्वित्य टी, द्वित्य एस व वॉय से होती है। सब का व्यवहार मेरी ओर घटिया रहा। शुरू में लेटिन और यूनानी के साथ हंगेरियन साहित्य भी पढ़ता था, लेकिन उसमें अपने खानदान के मारे अच्छे अंक पाने की संभावना न के बराबर थी, तो दो साल बाद छोड़ दिया। वह प्राध्यापक जिसने पिता का मित्र होने के नाते माताजी से वादा किया कि इस हालत में विश्वविद्यालय में मेरी देखभाल करेगा, वह भी गलियारे में मुझे पहचानना भी नहीं चाहता था।
पे.शा.– अंततः आपको विश्वविद्यालय में नौकरी कैसे मिली?
प्रो. तोतोशि–ऐसा लगता था कि ऐसी नौबत नहीं आएगी, कुछ नहीं मिलेगा। पहले से भी शर्त थी कि प्रोफेसर केवल किसी ओत्वोश कॉलेज में पढ़े हुए छात्रों में से ही कोई बन सकता है। ऐसा न हो कि राजधानी के धनाढ्य युवक, रईसजादे भी कुछ पा सकें। फिर यूनानी विभाग में थोड़ी संभावना होने लगी, जो उस समय अध्यापक बनने के करीब थे, अलग क्षेत्र में शोध करते थे। प्रोफेसर त्रैंचेञि-वल्दप्फ़ैल नहीं चाहते थे कि प्रोफेसर हर्मत्ता विभागाध्यक्ष बनें,इसलिए उन्होंने उनके लिए भारोपीय अध्ययन विभाग खोल दिया। यहाँ जुलाई 1953 से मुझे भी प्रो. हर्मत्ता के पास काम करने का मौका मिल गया। उनका नजरिया था कि मैं कुछ भी अपने-आप सीख सकता हूँ। 1971 तक विभाग में हर्मत्ता और मैं दोनों थे, और मुख्य रूप से अपने शोध के साथ-साथ लेटिन व्याकरण पढ़ाते थे। वैसे विभाग खोलने की अनुमति इसलिए मिली, क्योंकि 1952 में ’महाभाषावैज्ञानिक’ स्टालिन ने मार्क्सवाद का परित्याग किया और भारोपीय भाषा परिवार की धारणा की चर्चा और अध्ययन-अध्यापन करना जो नात्सी युग के दौरान बदनाम हुआ, फिर से मुनासिब हो गया।
लेटिन विभाग की एक अध्यापिका, स्वर्गीय इलोना कोमोर ने पहली बार सुझाव दिया कि मुझे संस्कृत भाषा सीखनी चाहिए  अगर भारोपीय तुलनात्मक भाषाविज्ञान में जाना है। मैंने सलाह मानी। पहले विश्वयुद्ध से पूर्व हंगरी में जो संस्कृत जानने वाले विद्वान थे, वे तब तक गुजर चुके थे। उस समय कोई संस्कृतविद् तो था ही नहीं, बल्कि समाजवादी शासन के सबसे कठिन दौर में विदेशी किताबों-पाठपुस्तकों का भी घोर अभाव था।
पे.शा.– इस परिस्थिति में आपने संस्कृत कैसे सीखी?
प्रो. तोतोशि–आरंभ में मेरे पास फ़िक का व्याकरण और एकमात्र शब्दकोश था, वह भी बहुत अच्छा नहीं। उस समय भारत के विषय में सारी किताबें एक ही अलमारी में पाई जा सकती थीं। आज कई गुना अधिक हैं। हफ्ते में चालीस घंटे संस्कृत पढ़ता गया, और एक कठिन पाठ चुना अनुवाद करने के लिए। यह हुआ शुकसप्तति यानी तूतीनामा, जो थोड़ी देर में मेरी पीएच.डी. का विषय बन गया। पहली बार इसे निर्णायक समिति के सामने प्रस्तुत करने की औकात 1956 में आई, पर मेरे छोटे भाई की क्रांति में भागीदारी और कैद की सज़ा की वजह से यह अनुमति निलंबित हो गई, और दुबारा मौका सिर्फ 1962 में मिला। उसी साल शुकसप्तति का अनुवाद भी छपा।
पे.शा.– 1956 की क्रांति के नाते कई अध्यापकों को विश्वविद्यालय से जाना पड़ा।
प्रो. तोतोशि–हाँ, ऐसा हुआ। मैं 23 अकतूबर को भी पढ़ा रहा था और मैंने अपने सारे छात्रों को भाग न लेने की सलाह भी दी। नहीं मानी, मेरी पसंदीदा छात्रा ने गोली खाकर दम तोड़ दिया। वास्तव में अगर कोई उस समय समाचारों और अंतर्राष्ट्रीय वातावरण को नजरंदाज करता था, तो उसको स्पष्ट था, सवाल तक नहीं उठा, कि क्रांति सफल हो सकती। परिस्थितियाँ इसके खिलाफ थी।
पे.शा.– आप अपनी जगह रहे और उसी साल हंगरी में इकलौते संस्कृतविद् होते हुए भी भारतविद्या पाठ्यक्रम चालू कर सके।
प्रो. तोतोशि–हंगरी के नेता भारतविद्या कॉर्स चालू करके भारत को प्रसन्न करना चाहते थे, और मंत्रालय यहाँ तक होशियार था कि अगर यह विभाग है, जिसके नाम में ’भारत’ शब्द पाया जाता है, तो तुरंत काम हो जाएगा। बधाई कि नेताओं की फरमाइश पहुँचने तक मुझे प्रचुर मात्रा में संस्कृत आने लगी थी। 1957 से लंबी मुद्दत तक संस्कृत मैं ही पढ़ाता था, प्रो. हर्मत्ता का क्षेत्र भारोपीय और ईरानी भाषाविज्ञान रहा। इसलिए कि मैं देर तक संस्कृत पढ़ाने के लिए अकेला था, इस क्षेत्र में मेरा अध्ययनसंबंधी काम ज़्यादा रहा, जबकि शोधकर्ता का काम लेटिन के क्षेत्र में करता था। कुल-मिलाकर साढ़े ४८ साल पढ़ाता था, और लेटिन व्याकरण पढ़ाना ४७ साल तक मेरी वरीयता थी। लेटिन व्याकरण के प्रस्ताव को पूरी तरह से नया रूप दिया, और फिलहाल लेटिन वाक्यनिर्माण विषय पर अपना बृहद वाक्यविज्ञान लिख रहा हूँ।
मैं  इंडोलोजी पढ़ाना, संस्कृत के पाठ पढ़ना और समझाना - विशेषतः जटिल शुकसप्तति को - मन का विलास मानता आया हूँ। यह एक अनूठी संस्कृति है जिसमें ३००० वर्षों से लगातार कृतियों को वाचन या लिखित रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने की अटूट परंपरा है। संस्कृत भारोपीय भाषाओं का आधारभूत आकार है, कठिन विषय। मेरा दायित्व था कि मूर्खों को इसकी ओर से फेरूँ। मेरी कक्षा में छात्र रोया भी करते थे, पर इसलिए नहीं कि यह मेरा आशय था। निकष से डरते थे। मेरे लिए हमेशा स्वाभाविक रहा, कि किसी चुनौती का हल पा सकता हूँ। जिसमें इतना आत्मविश्वास नहीं है, वह निश्चित तौर से बेबस बैठेगा, पर नाम तो नहीं कमा सकता।
पे.शा.– क्या आपने पहले भी कभी भारत की यात्रा की है?
प्रो. तोतोशि–हाँ, दो बार जा चुका हूँ। पहली बार 1972 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यलय के एक सम्मेलन में शामिल हुआ और 1982 में वाराणसी में आयोजित एक बैठक में भाषण दिया। वैसे कई और भाषावैज्ञानिक सम्मेलनों में भाग लिया था पूरे विश्व में।
पे.शा.– आपके छात्र कहते हैं कि आप सिर्फ तथ्य नहीं पढ़ाते थे, आप यह सिखाते थे, कैसे, जरा बताइए।
प्रो. तोतोशि–हाँ, कोई ऐसी लड़की भी मेरी छात्रा रही जिसकी भारत से खास रुचि नहीं थी, लेकिन वह जानती थी कि मेरे साथ वह अपनी बुद्धि और तेज़ कर सकती है, जैसा कि उस पर सान धरती हो। मुझे प्रसन्नता होती है कि भारोपीय अध्ययन विभाग में जिसका अध्यक्ष प्रोफेसर हर्मत्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद, 1987 से मैं रहा, वे ही पढ़ते हैं, जो मेरी बातें मानते थे और जिनकी मनोवृत्ति मेरे अनुकूल है। मैं हर दूसरे साल केवल दो छात्र पढ़ाता था, जिन्हें ३०-३५ उम्मीदवारों में से चुनता था। इन्होंने भारतविद्या, इस अद्भुत क्षेत्र में एक-एक विषय अपना अध्ययन का केंद्र बनाया और सब बेहतरीन निभाते हैं। मेरी शान है कि ३७ स्नातक छात्रों में से अनेक पीएच.डी. तक पढ़े हैं और सात यहाँ या दुनिया की किसी दूसरी संस्था में विश्वविद्यालय के स्तर पर अध्यापक व शोधकर्ता हैं। मेरा मानना है कि एक अध्यापक नसैनी जैसा है, जो अपने काम में तब कामयाब होता है जब अपने छात्रों को अपने आप से ऊपर पहुँचा सकता है।

प्रोफेसर तोतोशि छात्रों की पीढ़ियों के लिए अपनी कहावतों और आदतों के कारण सुप्रसिद्ध हो गए। कोई भी यह नहीं भूल सकता -कि उनकी कक्षाएँ रात के आठ से बारह बजे तक हुआ करती थीं,  -कि वे छात्राओं के लिए टैक्सी बुलाते थे, कि केवल उस कक्ष में प्रवेश करते थे जिसका कम से कम तापमान पच्‍चीस-तीस डिगरी होता था, -या कि दोनों कलाइयों में घड़ी बाँधते थे, फिर भी अक्सर देर से आते। पर सबसे पहले सभी  को यह याद आता  है कि  उनके रूप में एक भद्र मानव और एक  महान वैज्ञानिक ने एक ही शरीर का रूप धारण कर लिया है।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

हंगरी में भारत के वर्तमान राजदूत- महामहिम गौरीशंकर गुप्ता जी का साक्षात्कार

ओर्शोया सास--

ओर्शोया सास:- महामहिम जी, आप हंगरी आने से पहले हमारे देश के, लोगों के, संस्कृति के बारे में क्या सोचते थे? यहाँ आने के बाद के अनुभवों का इसपर क्या प्रभाव पड़ा?



महामहिम जी:- राजदूत के रूप में हंगरी आने से पहले भी मैं दो बार यहाँ आ चुका हूँ। पहली बार मैं उन्नीस सौ पचासी में आया था और दूसरी बार उन्नीस सौ अठानवे में आया था। तो मुझे यहाँ के लोगों का, यहाँ की संस्कृति का कुछ आइडिया था। पूरी तरह से नहीं लेकिन कुछ आइडिया था। मुझे यह भी पता था कि हंगरी पूर्वी और पश्चिमी देशों के बीच में एक ब्रिज, पुल के रूप में है। यहाँ के लोग भारतीय सभ्यता और संस्कृति को काफी पसंद करते हैं।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी आपने एक इंटरव्यू में कहा है कि आपको यहाँ बिताये हर मिनट से आनंद की अनुभूति होती है, इसका क्या कारण और मतलब है?



महामहिम जी:- आनंद की अनुभूति इसलिए होती है कि यह देश बहुत सुन्दर है, यहाँ के लोग अच्छे हैं, उनका व्यवहार बहुत अच्छा है। वे भारतीय सभ्यता, संस्कृति और लोगों को बहुत पसंद करते हैं। अगर आप पश्चिमी योरोप के देशों से हंगरी की तुलना करें, तो यहाँ के लोगों में मानवीयता की भावना ज़्यादा है, इनसे संपर्क करना ज़्यादा आसान है। मनुष्यों के बीच में जो इंटरएक्शन होता है, हंगरी में वह बड़ा सरल है। यहाँ के लोगों को आप मित्र भी बना सकते हैं, जबकि पश्चिमी योरोप के देशों में यह थोड़ा मुश्किल काम है।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी जब हंगरी और भारत के संबंधों की चर्चा चलती है तो हम हमेशा बहुत पुराने, भाईचारा पूर्ण सांस्कृतिक संबंधों के बारे में सुनते हैं। आजकल राजनैतिक, वित्तीय और शैक्षिक संबंध भी गहराते जा रहे हैं। इन संबंधों में से कौन-कौन से संबंध दूर तक जाने की संभावना है?



महामहिम जी:- भारत के संबंध हंगरी के साथ बहुत पुराने हैं। अगर आप हमारे संबंधों का इतिहास देखें, तो दोनों देशों के बीच में पंद्रहवीं, सोलहवीं सदी में भी संपर्क व संबंध रहे हैं। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में काफी संपर्क रहे हैं। अगर आप बड़े व्यक्तियों की बात करें, तो रबिन्द्रनाथ टैगोर का हंगरी से बहुत गहरा संबंध रहा है। उसी तरह से चोमा कोरोशी, जो हंगरी के भारतविद थे, उनका बहुत गहरा संबंध है हिन्दुस्तान के साथ। एलिज़ाबेथ शश-ब्रुन्नैर और उनकी बेटी एलिजाबेथ ब्रुन्नैर दोनों का भी हिंदुस्तान से बहुत गहरा संपर्क रहा है, वे दोनों वहीँ गुज़री हैं, उनकी कब्रें भी वही हैं। इसी तरह से चोमा कोरोशी की कब्र भी वहीँ पर है। इसी कड़ी में अमृता शेरगिल का नाम भी आता है, जिनका हंगरी से बहुत गहरा संबंध है, उनकी माता हंगेरियन थी और पिता भारतीय थे। वे भी एक बहुत बड़ी पेंटर रही हैं। अगर ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो हमारे संबंध काफी गहरे रहे हैं। रबिन्द्रनाथ टैगोर का तो बहुत गहरा संबंध है। आप जानती ही हैं, वे उन्नीस सौ छब्बीस में बलातोनफुरेद में रहे थे। जब हंगरी में कम्युनिस्ट शासन था, उस समय भी हिंदुस्तान के साथ हंगरी का बहुत गहरा संबंध था। हमारे यहाँ उस समय रूपी ट्रेड का समझौता था। उसके तहत हंगरी के साथ काफी व्यापार होता था। हमारे यहाँ पच्चीस से ज़्यादा संयुक्त उद्यम (जोइंट वेंचर्स) थे। उन्नीस सौ नब्बे के बाद, जब से हंगरी प्रजातांत्रिक (डेमोक्रटिक) सिस्टम में आया है, उसके बाद भी हमारे संबंध काफी गहरे होते चले जा रहे हैं। हमने विभिन्न क्षेत्रों में समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। हमारा जो व्यापार है, वो पिछले वर्षों में काफी बढ़ा है। मैं यह नहीं कहता कि बहुत अच्छा है, लेकिन फिर भी दोनों देशों के बीच में छह सौ मिलियन डालर का व्यापार है । इसके अलावा आर्थिक संबंधों में काफी जोइंट वेंचर्स हैं दोनों देशों के बीच में। कुछ हंगरी में हैं, कुछ इण्डिया में भी हैं। संस्कृति और कला की क्षेत्र में तो वैसे भी बहुत गहरे संबंध हैं।
इन्डियन डांस ग्रुप्स, संगीतकार और यहाँ आते रहते हैं और अपनी पर्फोर्मेंस देते रहते हैं। इन्डोलॉजिस्ट व अन्य विषयों के विशेषज्ञ भी आते हैं । हंगरी में हिन्दुस्तानी नृत्य और संगीत की क्लासिज़ चलती हैं। हंगरी के नागरिकों का किसी न किसी रूप में हिंदुस्तान के साथ संबंध है। काफी लोग जो हिंदुस्तान घूमने के लिए जाते हैं, वे भी बड़ी अच्छी यादें लेकर वापस आते हैं। वे यहाँ के अन्य नागरिकों से बातचीत करते हैं। और इसकी वजह से हंगरी में योग बहुत प्रसिद्ध है। बुदापैश्त में २०० से ज़्यादा योग सेण्टर हैं। यहाँ ६-७ हिन्दुस्तानी संगीत और नाच-गाने के शिक्षक हैं, जो स्वयं भी हिन्दुस्तानी म्यूज़िक और हिन्दुस्तानी डांसिज़ परफोर्म करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अगर आप देखें तो यहाँ इंडोलोजी में काफी लोगों की रुचि है। ऐल्ते यूनिवर्सिटी में हिंदी और संस्कृत की पढ़ाई जाती हैं। आयुर्वेद में भी यहाँ के लोगों की काफी गहन रूप से रुचि है। इस साल आयुर्वेद की यहाँ एक बड़ी कान्रेंर्स हुई थी। हम चाहते हैं कि अगले साल भी यहाँ एक बड़ी कान्रेंेकस करें। यहाँ दो तीन आयुर्वेदिक केंद्र भी हैं। तो समुचित रूप से देखें तो हमारे संबंध ऐतिहासिक हैं, और अभी भी वे आगे की तरफ बढ़ते चले जा रहे हैं।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी आप अब क़रीब ३ महीने से रह रहे हैं हंगरी में, आपने अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्घाटन भी किया है और हंगरी में पर्यटन भी किया है। इनके आधार पर आप क्या सोचते हैं-

यहाँ के लोगों की भारतीय संस्कृति की कल्पना कैसी है?

क्या इसमें कुछ बदलने या जोड़ने की ज़रूरत है?



महामहिम जी:- जैसे मैंने अभी आपको बताया, कि भारतीय संस्कृति में हंगेरियन लोगों का काफी इंटेरेस्ट है, काफी रुचि है। यहाँ पर हर सप्ताह कम से कम एक या दो भारतीय संगीत या भारतीय नाच-गाने के प्रोग्राम होते हैं। और सिर्फ बुदापैश्त में ही नहीं बल्कि अलग-अलग शहरों में होते हैं। यह तो एक बहुत ही अच्छी प्रवृत्ति है। हम इससे बड़े खुश हैं। और हमें देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम हिंदुस्तान में ही हैं।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी दूतावास के पास जो नया भवन, सांस्कृतिक केंद्र बन रहा है, उसमें किस तरह के कार्यक्रमों का आयोजन करने की योजना है?



महामहिम जी:- सांस्कृतिक केंद्र में हम कई तरह के आयोजन करेंगे। नाच-गाने के अलावा हम यह भी चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति से जुड़े विषयों पर कॉन्रेहमसेज़ हों। हम चाहते हैं कि कुछ प्रदर्शनियाँ की जाएँ, किताबों की, चित्रों की। हम यह भी चाहते हैं कि यहाँ हिन्दुस्तान शिल्पकला, इतिहास सभ्यता आदि जैसे विषयों पर भाषण हों। ताकि हंगेरियन लोगों को कुछ अधिक जानकारी मिल सके। इसके अलावा हम चाहेंगे कि हंगरी के सांस्कृतिक संस्थानों के साथ संयुक्त रूप से कार्यक्रम भी बनाएं। इससे यह होगा, कि दोनों देशों के लोग एक दूसरे से मिल-जुलकर कार्यक्रम बनाएंगे। जिससे आपस में उनकी समझ और ज़्यादा बढ़ेगी।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी अगले साल विश्वप्रसिद्ध लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जन्म की एक सौ पचासवीं वर्षगाँठ मनाई जानेवाली है। क्या इस अवसर पर कुछ विशेष कार्यक्रम भी होंगे, बुदापैश्त में और बालातोंफुरेद में?



महामहिम जी:- हम अभी एक बहुत बड़ी कॉन्रे रस और एक्सहिबिशन करने की योजना बना रहे हैं, मई २०११ में। इसमें हम योरोप के विभिन्न हिस्सों से भारतविद्याविदों को बुलाएंगे। ये लोग रवीन्द्रनाथ ठाकुर, उनकी रचनाओं और उनके दर्शन के बारे में अपने अनुभव लोगों को बताएंगे और चर्चा करेंगे। यह एक विश्व कॉन्रेहैस होगी। एक विश्व कोंफेरेंस पेरिस में भी भारतीय सरकार की तरफ से होगी। इसके अलावा रवीन्द्रनाथ ठाकुर से सम्बंधित जितनी भी पेंटिंग्स हैं और उनका संगीत है, उसकी प्रदर्शनी इस कॉन्रेबतस के दौरान यहाँ की जाएगी। बालातोंफुरेद में हम सांस्कृतिक प्रोग्राम करने की योजना बना रहे हैं। इसके साथ हम यह भी सोच रहे हैं, कि अमृता शेरगिल की पेंटिंगस का आयोजन भी बालातोंफुरेद में किया जाए। यह अभी पक्का नहीं है, लेकिन इसपर विचार चल रहा है।



ओर्शोया सास:- महामहिम जी आप राजदूत होने के साथ-साथ कवि व लेखक भी हैं। आपके हिंदी भाषा के बारे में विचार क्या हैं? भारतीय लोगों की अंग्रेज़ी बोलने की इच्छा के आगे हिंदी हार तो नहीं जाएगी?



महामहिम जी:- नहीं, हिंदी की हार कभी नहीं होगी, लेकिन यह एक सच्चाई है कि हिंदी जो है, उसकी शुद्धता थोड़ी कम होती चली जा रही है। भारतीय लोग, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, कई बार शुद्ध हिंदी के कई शब्दों का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। क्योंकि अंग्रेज़ी के शब्द हिंदी के साथ इतने मिल-जुल गए हैं कि जब आप बोलते हैं तो हिंदी के साथ-साथ कुछ अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं। मैं यह नहीं कहता कि नयी भाषा है, लेकिन यह एक नया विकास है, जो हिंदी भाषा में हो रहा है। कुछ लोग इसको हिंग्लिश बोलते हैं कि जिसमें हिंदी और इंग्लिश का एक समन्वय होकर एक नयी भाषा खुद सामने आ रही है। लेकिन मैं नहीं मानता कि यह नयी भाषा है, लेकिन सच्चाई यह है कि अंग्रेज़ी के शब्द हिंदी में मिल-जुल गए हैं, और जो लोग भारत में हिंदी बोलते हैं वे बिलकुल शुद्ध हिंदी नहीं बोल पाते हैं। वे अंग्रेज़ी के बहुत शब्द उसके साथ जोड़कर फिर बातचीत करते हैं।

ओर्शोया सास:- महामहिम जी विदेशों में कई विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा सिखाई जाती है। हम भी भाग्यशाली हैं कि हमारे पास मारियाजी हैं जिनको कुछ साल पहले दिल्ली में ग्रियर्सन हिंदी सेवी पुरस्कार मिला है हिंदी भाषा का प्रचार करने के लिए। क्या विदेशों में हिंदी सीखने के इस जोश का भारत में भी कुछ प्रभाव पड़ सकता है हिंदी की भूमिका को आगे बढ़ाने में?



महामहिम जी:- नहीं, ऐसा है कि हिंदी की शुद्धता बहुत ज़रूरी है। मैं इस चीज़ में पूरा विशवास करता हूँ। और मैं यह भी चाहता हूँ कि हिंदी को और ज़्यादा प्रोत्साहन दिया जाए। लेकिन जबसे ग्लोबलाइज़ेशन विश्व में चालू हुआ है तब से अंग्रेज़ी का प्रभुत्व हिंदुस्तान में ही नहीं लेकिन संसार के और भी देशों में बढ़ता चला जा रहा है। मैं फ़्रांस में था। एक समय था जब फ़्रांस में अंग्रेज़ी बहुत कम बोली जाती थी बहुत कम समझी जाती थी। आज वहाँ का प्रत्येक नवयुवक फ्रेंच के साथ-साथ अंग्रेज़ी बोलता है। यह हंगरी में भी ऐसा ही होता चला जा रहा है। जितने भी नवयुवक हंगरी में हैं, हंगेरियन के साथ उनकी दूसरी भाषा अंग्रेज़ी है। इसी तरह से हिंदुस्तान में भी अंग्रेज़ी दूसरी भाषा है। हिंदी के साथ-साथ अंग्रेज़ी दूसरी भाषा है, लेकिन जो विकास हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों के समन्वय का हो रहा है, वह और देशों में नहीं हो रहा है। ऐसा नहीं है कि अंग्रेज़ी और फ्रेंच मिक्स हो रही हैं, ऐसा नहीं होता। या हंगेरियन और अंग्रेज़ी मिश्रित हो रही हैं, ऐसा नहीं होता। लेकिन हिंदुस्तान में अंग्रेज़ी और हिंदी का मिश्रण होना चालू हो गया है। वह एक अच्छी चीज़ नहीं है। और हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम इससे दूर हटें, हिंदी की शुद्धता बरकरार रखें और साथ में अंग्रेज़ी की शुद्धता भी बरकरार रखें। लेकिन हिंदुस्तान में इतनी बड़ी जनसँख्या है कि इन सब लोगों को नियंत्रित करना और उनको ठीक ढंग से आगे पहुँचाना इतना आसन भी नहीं है। लेकिन मैं आशा करता हूँ कि हिंदी की शुद्धता बढ़कर ही रहेगी। पहले भी हिंदी में अगर आप देखें तो उर्दू का मिश्रण हुआ है, पर्शियन शब्दों का मिश्रण हुआ है, टर्किश शब्दों का मिश्रण भी हुआ है, अरेबिक शब्दों का मिश्रण भी हुआ है। तो हिंदी जो है वह सबको अपने अन्दर समाहित कर लेती है। तो मैं समझता हूँ कि कुछ अंग्रेज़ी के शब्दों को भी हिंदी अपने आप में समाहित कर लेगी।



ओर्शोया सास:- आपको क्या लगता है, आजकल जो बड़ा आर्थिक विकास दिखता है भारत में उसका भी प्रभाव हो सकता है हिंदी भाषा पर?



महामहिम जी:- बिलकुल होगा। जो हो रहा है सचमुच अभी। जब देश की आर्थिक व्यवस्था सुधरती चली जा रही है, तो विदेशी लोग बड़ी संख्या में हिंदुस्तान जा रहे हैं। वे अपने कारोवार के साथ जा रहे हैं, इंडस्ट्रीज लगा रहे हैं। और हर देश के लोग हिंदुस्तान में अपना ऑफिस खोलना चाहते हैं। तो उनके लिए ज़रूरी है कि वे भी थोड़ी हिंदी सीखें। और इसी की वजह से विदेशों में हिंदी का प्रचार और प्रसार हो रहा है, और होगा। अगले १० साल में हिंदी और ज़्यादा विकसित होगी विदेशों में।



ओर्शोया सास:- महामहिम जी प्रमोद जी द्वारा संपादित भित्ति-पत्रिका ‘प्रयास’ अब इन्टरनेट पर भी पढ़ी जा सकती है। ऐल्ते विश्वविद्यालय का हिंदी को आगे बढ़ाने का यह प्रयास आपको कैसा लग रहा है?



महामहिम जी:- यह पत्रिका बहुत अच्छा एक निर्देश है। एक अच्छा कदम है। इस कदम से हिंदी का हंगरी में और ज़्यादा विकास होगा। जो छात्र-छात्राएं हिंदी पढ़ रहे हैं, उनको हिंदी समझने और उनकी हिंदी को सुधारने का एक अच्छा अवसर मिलेगा। तो इसके लिए प्रमोदजी को धन्यवाद देता हूँ, उनको बधाई देता हूँ कि यह नया कदम उठा रहे हैं।



ओर्शोया सास:- महामहिम जी हमारा यह दूसरा प्रोग्राम भी चल रहा है काफी सालों से जो भारतीय दूतावास और ऐल्ते विश्वविद्यालय साथ-साथ चलाते हैं। क्या इसको आगे बढ़ाने या बदलने की कुछ योजनाएं हैं?



महामहिम जी:- बिलकुल, मैं यह चाहता हूँ कि एक तो हिंदी की जो छात्रवृत्ति मिलती है हिंदी आगे पढ़ने के लिए, वह अभी सिर्फ २ छात्रवृत्तियां दी जाती हैं कई वर्षों से। मैं अभी कोशिश कर रहा हूँ, कि अगले साल ४ छात्रवृत्ति दें और उसके अगले साल ६। तो छात्रवृत्तियों की जो संख्या है वह बढ़े। इससे यहाँ जो हिंदी सीखनेवाले छात्र-छात्राएं हैं वे हिंदुस्तान में जाकर और अच्छी हिंदी सीख सकें। दूसरा, मैं यह चाहता हूँ कि जो बहुत अच्छे विद्यार्थी हैं यहाँ पर उनको पुरस्कार दिया जाए। अच्छा पुरस्कार दिया जाए। जिससे कि उनको प्रोत्साहन मिले हिंदी आगे। हम पिछले साल के पुरस्कारों के बारे में निर्णय ले चुके हैं। पुरस्कृत होनेवाले छात्रों में ३ विश्वविद्यालय के छात्र और ३ दूसरी कक्षाओं के छात्र हैं। मैं चाहता हूँ कि सितम्बर-अक्तूबर में एक छोटी सा कार्यक्रम किया जाए, जिसमें हम इन सब लोगों को पुरस्कृत करें। हो सकता है कि यह सांस्कृतिक केंद्र के उद्घाटन के समय हो। और इस संबंध मैं और भी निर्णय धीरे-धीरे लूँगा इससे कि हिंदी का प्रचार और प्रसार बढ़े। भारत में हिंदी प्रचार का जो ऑफिस है, उससे मैं बात करूँगा, और चाहूँगा कि कुछ ऐसे कदम उठाए जाएँ कि विद्यार्थियों को प्रोत्साहन मिले।



ओर्शोया सास:- महामहिम जी हंगरी के इन्डॉलोजिस्टों लोगों को एक साथ इकठ्ठा करने की कोई योजना है?



महामहिम जी:- बिलकुल, मैंने मारियाजी कहा है कि मैं हंगरी के इन्डॉलोजिस्टों का एक छोटा सा सम्मेलन करना चाहता हूँ। उसमें हम आपस में सब चीज़ों को विस्तार से सोचें-समझेंगे, और यह कोशिश करेंगे कि इंडोलोजी को और ज़्यादा लोगों के नज़दीक कैसे ले जायें। यह तब संभव होगा जब हम आपस में बैठकर विचार करेंगे। एक दूसरे के विचारों को सुनेंगे, समझेंगे और उसके बाद आगे बढ़ने के लिए एक योजना ऐसी तैयार करेंगे जिससे कि इंडोलोजी हंगरी के लोगों में और ज़्यादा लोकप्रिय हो।



ओर्शोया सास:- अंत में आप भारत प्रेमी हंगरीवासियों को और यहाँ रहने वाले भारतीय लोगों को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

महामहिम जी:- मेरा संदेश सबके लिए यही है कि हिंदुस्तान व हंगरी के लोग आपस में मिलजुलकर आगे बढ़ें, एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझें, एक दूसरे से सीखें। इससे हंगरी की और हमारे देश की भी समृद्धि बढ़ेगी, दोनों देशों की सभ्यता और संस्कृति में और ज़्यादा मेलजोल होगा और हम लोगों के संबंध और ज़्यादा नज़दीकी बन जाएँगे। इससे दोनों देशों को और दोनों देशों की जनता बहुत फायदा होगा।

रविवार, 25 जुलाई 2010

हंगरी में भारत के पूर्व राजदूत, महामहिम रंजित राय के साथ साक्षात्कार



साक्षात्कारकर्ता : रोबर्त वालोसी एवं सुच वैरोनिका

इस वर्ष का वसंत न सिर्फ प्रकृति, बल्कि बुदापैश्त के भारतीय राजदूत महोदय के जीवन में भी परिवर्तन लाने वाला था। भारत के पूर्व राजदूत, महामहिम रंजित राय ने हंगरी से विदा ली और उनकी जगह वर्तमान राजदूत, महामहिम गौरी शंकर गुप्त ने कार्यभार ग्रहण कर लिया। हमारी जिज्ञासा थी, कि राजदूत महोदय कौनसे अनुभवों और कौनसी यादों को अपने साथ (भारत) ले जाएँगे। इसकी जानकारी लेने के लिए ऐल्ते की भित्ति-पत्रिका "प्रयास" ने राजदूत के साथ मुलाक़ात करने का निर्णय लिया। पत्रिका के संपादक व हमारे हिन्दी प्राध्यापक, प्रमोद कुमार शर्मा जी ने मुलाकात की तिथि व समय का इंतज़ाम किया। मैं और रोबर्त दिनांक १८ मार्च को ११:३० को सूरज की धूप में लिपटे राजदूतावास में पहुँचे। दूतावास में प्रवेश करते समय हम दोनों बहुत चिंतित थे, कारण यह हमारी दूतावास की पहली यात्रा थी। वहाँ क्या होगा? कैसे होंगे राजदूत जी? क्या हमारी हिन्दी इतनी अच्छी हो गई है कि हम उनकी बातें समझ सकेंगे? एक दूसरे से बात करके हमारा उत्साह बढ़ने लगा पर धीरे-धीरे एक तरह का डर हमारे मन में घर करने लगा। लेकिन महामहिम राजदूत महोदय से हाथ हिलाते ही हमारी सारे परेशानियाँ पूरी तरह से उड़ गयीं। महामहिम रंजित राय जी ने एक आम व्यक्ति की तरह हमारा स्वागत किया। हमें ऐसा लगा कि हम किसी राजदूत महोदय से नहीं बल्कि अपने किसी अच्छे परिचित या दोस्त से बातचीत की ! हमारी बातचीत कुछ इस प्रकार हुई :

वैरोनिका : जब आपको पता चला था कि आप हंगरी जाएँगे, तो आपके मन में हंगरी के बारे में सबसे पहले क्या विचार आया था?

महामहिम जी : बहुत ख़ुशी हुई इससे, क्योंकि सन २००३ में मैं घूमने के लिए हंगरी आया था, तीन-चार दिन तक रहा, बुदापैश्त, बालाटन गया था और अनेक लोगों से मुलाकात हुई। उस वक्त मुझे आप का देश बहुत अच्छा लगा, लेकिन उस वक्त मुझे पता नहीं था, कि मैं एक बार फिर से वापस जाऊँगा। तो बहुत खुशी हुई सुनके कि मुझे हंगरी में पोस्ट किया गया हैं।

रोबर्त : हंगरी में किस चीज ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया ?

महामहिम जी : मुझे यहाँ सबसे अच्छा यह लगा कि हंगरी के लोगों में हिंदुस्तान के प्रति बहुत अच्छा भाव है। लगता है कि यहाँ भारतीय संस्कृति बहुत लोकप्रिय है। लोग हिन्दुस्तान के बारे में कुछ न कुछ जानते हैं, हिन्दुस्तानी सभ्यता और मशहूर व्यक्तियों के बारे में जैसे, महात्मा गांधी इंदिरा गांधी और रबीन्द्रनाथ ठाकुर। यहाँ के लोगों की नृत्यकला में भी विशेष रूचि है। कहीं न कहीं सब लोग हिन्दुस्तान को एक बहुत अच्छी नज़र से, बहुत अच्छी दिशा से देखते हैं। यह इसलिए भी बहुत अहम् बात है, क्योंकि देशों में संबन्ध भी इतने अच्छे है, जितने लोगों के बीच में। जिस तरह की दिशा से लोग दूसरे देश को देखते हैं, उसी तरह वे उस देश के लोगों के बारे में सोचते हैं। उसके आधार पर दोनों देशों, दोनों देशों के सरकारों में संबन्ध बनते हैं।

रोबर्त : आप हंगरी से पहले जिन देशों में थे, क्या वहाँ भी ऐसी स्थिति थी ?

महामहिम जी : मैंने हंगरी से पहले केवल चार-पांच देशों में सरकारी काम किया। युगांडा का हाल बिलकुल अलग हैं, क्योंकि वह अंग्रेज़ कॉलोनी थी, वहां बहुत भारतीय लोग रहते हैं, इसलिए उसकी हंगरी से तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन ऑस्ट्रिया में स्थिति हंगरी के समान है। वहाँ विश्वविद्यालय में बहुत मशहूर प्रोफेसर्स काम करते हैं और इन्डोलॉजी का नाम बहुत अच्छा है। मैं इन देशों के युनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में भी था। न्यूयोर्क भी अलग है, क्योंकि वह हंगरी के मुकाबले बहुत एक इंटरनेशनल सिटी है। हर जगह की अपनी विशेषताएँ हैं, और मुझे सारी पोस्टिंग्स बहुत अच्छी लगी थीं।

रोबर्त : अभी आप कहाँ जाएँगे ?

महामहिम जी : हंगरी के बाद मैं वियतनाम जा रहा हूँ, हनोई।

वैरोनिका : यह किस का निश्चय था?

महामहिम जी : यह सरकार का निश्चय होता है, लेकिन हम से भी पूछा जाता है। मैंने कहा कि मेरी भी रुचि है।

वैरोनिका : भारत और हंगरी के संबंध और मजबूत करने के लिए भारत सरकार किस तरह के कदम उठा रही है?

महामहिम जी : देखिए जैसा कि मैंने कहा है, सब से अहम् चीज़ यह होती है, कि लोगों के बीच संबंध अच्छा होने चाहिए। उसके बाद सरकार और व्यापारिक कम्पनियों के बीच में होने वाले संबंध अलग तरह के होते हैं। हंगरी के साथ उनका संबंध पिछले कुछ सालों से बढ़ रहा है। भारत की अर्थ व्यवस्था में बहुत परिवर्तन आये हैं। आधुनिक काल में हमारी प्रगति का रफ़्तार तेज़ है, हर साल जीडीपी बढ़ता है, ७-८ % है अभी । हमारी कंपनियाँ पूरे विश्व में फैल रही हैं, पिछले कुछ सालों से हंगेरियन कंपनियाँ में भी बहुत रूचि हुई है। बहुत अहम् बात है, कि हंगरी ईयू का सदस्य बन गया है, क्योंकि हंगरी के साथ हमारे जो रिश्ते थे, और मजबूत हो गए। हमारे लिए बहुत अच्छी बात है, कि हंगरी के ज़रिये हमारा ईयू से भी अच्छा संबंध बनाया जा सकता है। हंगरी और ईयू से जो रिश्ते हैं, वे तो हैं ही, लेकिन उन्हें और मजबूत करने के लिए दोनों देशों को कदम उठाने हैं। हंगरी के विदेशमंत्री भारत गए, भारत के वाणिज्यमंत्री हंगरी आए, हुन्गेक्स्पो - अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्य मेले में कई भारतीय कंपनियाँ आईं। कई कंपनियों ने इन्वेस्ट किया, जैसे तिसवश्वारि में या टांसइलेक्ट्रो के साथ। इससे भी स्पष्ट है, कि भारत की हंगरी में काफी रुचि है।

शिक्षा के लिए भी बहुत अहम् है कि विश्वविद्यालयों और रिसर्च इंस्टीट्यूटों में परस्पर संबंध बढ़ें। पिछले साल ऐल्ते के रेक्टर (उपकुलपति) दिल्ली गए, जहाँ विश्वविद्यालयों के बीच होने वाले संबंधों और एडुकेशनल सेक्टर की ओर से अहम् प्रश्न उठाए गए। हंगरी में शिक्षा बहुत अच्छी है, और मुझे पता चला कि हंगरी की यूनिवर्सिटियाँ चाहती हैं कि भारतीय छात्र यहाँ आये। यह भी दोनों देशों के संबंध ओर मजबूत रखेगा। सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्त्व की बात है, कि बुदापैश्त में भारतीय सांस्कृतिक केंद्र बन रहा है, उसकी भी अहम् भूमिका रहेगी।

रोबर्त :और आप क्या सोचते हैं, इस संबंध का भविष्य कैसा होगा?

महामहिम जी : बहुत बढ़िया ! २००९ में विश्व अर्थ व्यवस्था बिगढ़ी, लेकिन जो घटना घटी, उससे तो लंबा दौर देखना चाहिए। इसलिए मेरी राय है, कि हंगरी और हिन्दुस्तान के बीच भविष्य में बहुत बढ़िया संभावनाएँ हैं। उदाहरण के लिए सन २००५ में वाणिज्य १४० मिलियन डॉलर था, जो सन २००८ में ७०० मिलियन डॉलर हो गया, मतलब कि पांच गुना बढ़ा ! इसलिए दोनों देशों को आपस में विचार विमर्श करना होगा, कि भविष्य में कैसे कदम उठाए जाएँ, कैसे दोनों देशों के व्यापार के लोगों को इकट्टा करना होगा।

रोबर्त : हंगरी में भारतीय संस्कृति के विस्तार में आप हिन्दी भाषा की भूमिका किस प्रकार देखते हैं?

महामहिम जी : इसकी बहुत अहम भूमिका हैं, क्योंकि हिन्दुस्तान में सबसे अधिक लोग हिन्दी बोलते हैं, और किसी देश की संस्कृति को गहराई से जानने के लिए उसकी भाषा सीखना अनिवार्य हैं। दूसरी ओर अगर हम बिलकुल गहराई से भारतीय संस्कृति और भारत को जाने चाहते हैं, तो हिन्दी के अलावा भारत की अन्य भाषाओं को भी पढ़ना चाहिए। क्या आप के विभाग में हिन्दी और संस्कृत के अलावा दूसरी भाषाएँ भी पढ़ाई जाती हैं ?

रोबर्त : नहीं, सिर्फ संस्कृत और हिन्दी और इनके मध्यकालीन रूप, पाली और ब्रज भाषा। इसलिए मैं जुलाई से एक पूरा साल केरल में बिताऊँगा, एक दूसरी आधुनिक भाषा सीखने के लिए।

महामहिम जी : मलयालम तो बहुत मुश्किल भाषा है।

वैरोनिका : ज़रूर, लेकिन मेरा विश्वास है, कि एक साल के बाद रोबर्त हमारे विभाग में द्रविड़ भाषाओं का नया विशेषज्ञ बनेगा ! ।।।मुस्कान…

महामहिम जी और रोबर्त : ऐसा होना चाहिए !

वैरोनिका : आजकल हिन्दी पर अंग्रेज़ी भाषा ज्यादा प्रभाव डालती है, क्या आप इस परिवर्तन को बुरी बात मानते हैं?

महामहिम जी : मैं सोचता हूँ, कि यह बुरी बात नहीं है। यह तो ऐसे है, कि भाषा देश के साथ आगे बढ़ती है, उसमें चेंजिज़ होते हैं। भाषा एक जीवंत चीज़ है, उसको एक दृढ फॉर्म में नहीं रखना चाहिए। यह भी एक प्रश्न है, कि आप शुद्ध हिन्दी को क्या मानते हैं ? इसका मतलब है, कि उसमें संस्कृत या उर्दू का ज़्यादा प्रभाव होगा ? मेरे ख़याल से सबसे अधिक लोग जो हिन्दी बोलते हैं, एक तरह का मिश्रण बोलते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रगति है, और मुझे ऐसे नहीं लगता कि इसको बदलना होगा। लेकिन आप दोनों बहुत सुन्दर हिन्दी बोलते हैं, बहुत अच्छी बात हैं। आप कैसे प्रैक्टिस कर सकते हैं?

दोनों एक साथ: प्रमोद जी के साथ (ठहाका) और हम बार-बार भारतीय छात्रों से बातचीत करते हैं, लेकिन समस्या यह हे, कि वे बहुत अच्छी हंगेरियन बोलते हैं। (ठहाका)

रोबर्त : दुनिया में एक ऐसा टेंडेसी है, कि इकोनोमी की भाषा अंग्रेज़ी हैं। क्या हिन्दी भी ऐसी बन सकती हैं ?

महामहिम जी : हो सकता हैं, क्योंकि अलग-अलग देशों में हिन्दी बोलने वाले बहुत हैं और हिन्दी विश्व की भाषाओं में उभर रही हैं। इसमें चलचित्र, फिल्म की भी अहम् भूमिका है, जो सारी दुनिया में हिन्दी का प्रचार करती रही हैं।

रोबर्त : ऐल्ते विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के कार्यों के विषय में आपकी राय क्या है ?

महामहिम जी : मेरी राय में ऐल्ते में जो काम किया गया हैं, हिन्दी का प्रचार, इसे सीखने के लिए संभवत सम्मेलन वगैरह बहुत अहम् बात है, क्योंकि भाषा के साथ संस्कृति भी जुड़ी हुई है, भाषा उसकी राजदूत है। बहुत अच्छा काम किया है आपने जिस के लिए हम आपके आभारी हैं। हंगेरियन इंडोलोजी योरोप में मशहूर है, और यह भी बड़े महत्त्व की बात है कि अध्यापक, अध्यापिका और छात्र न सिर्फ अच्छे विशेषज्ञ हैं, बल्कि बहुत सक्रिय, एक्टिव भी हैं। हिन्दी और संस्कृत सम्मेलन, हर साल विश्व हिन्दी दिवस आयोजित किया जाता है, और अन्य त्यौहार मनाये जाते हैं। इन के अलावा हिन्दी पत्रिका, जो छात्रों से शुरू किया है, भी बहुत अच्छा कदम है। इन सारे बातों से पता चलता है कि हंगरी में भारतीय संस्कृति और भारतीय स्टडीज़ में कितनी रूचि हैं। हम बहुत आभारी हैं इन सारे काम के लिए। एक प्रश्न है, कि भविष्य में इस दिशा में और क्या काम किया जा सकेगा। सब से महत्त्वपूर्ण काम लोगों को इकट्टा करना होगा। हमें चाहिए कि विश्वविद्यालय में पुरानी फिलोलोजी की परम्परा आगे चलायें और इससे समानांतर आधुनिक भारतीय स्टडीज़ को भी बढाइए। रेक्टर के साथ भी विचार-विमर्श किया गया है कि इसका क्या मौक़ा मिलेगा। इसमें नए सांस्कृतिक केंद्र का बड़ा योगदान होगा। हमारी आशा है, कि इसकी मदद से दोनों देशों का अच्छा सम्बन्ध और मजबूत होगा। नए राजदूत का कर्तव्य भी यह होगा।

वैरोनिका : और हमारे साथ साक्षात्कार करना, यहाँ से जाने के बाद आप यहाँ की क्या चीज मिस करेंगे?

महामहिम जी : मैं मिस करूँगा सभी लोगों को, बुदापैश्त को, इस बढ़िया दृश्य को, जो मेरे दफ्तर की खिड़की से दिखता है, दूना को। आपका बहुत सुंदर देश, और राजधानी है। बुदापैश्त की एक विशेषता डेन्यूब, दूना नदी है, जो शहर के बीचोंबीच बहती है। ऐसे कम नगर हैं, जिन में नदी की इतनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।, जिससे शहर एक तरह खुलता है, उसका पूरा वातावरण दूना से प्रभावित है। मैं हंगरी से बहुत अच्छी यादों के साथ विदा लूँगा।

रोबर्त : हम इस साक्षात्कार के लिए आक के आभारी हैं, और हमारी आशा है, कि आप भविष्य में एक बार वापस आएँगे।

महामहिम जी : अगर मौक़ा मिलेगा, तो ज़रूर आऊंगा !

(अफ़सोस की बात है महामहिम राजदूत महोदय इतने व्यस्त थे कि हमें उनसे बातचीत करने के लिए सिर्फ आधा घंटा ही मिल पाया। पता ही नहीं चला कि कब बीत गया। शुरूआत तो ऐसी थी कि वैरोनिका के काँपते हाथ से चाय की चम्मच गिरते-गिरते बची, कुछ ही देर में उसकी यह घबराहट लापता हो गयी थी। बाहर जाकर हमने आपस में बात की। महामहिम से हम दोनों की यह मुलाक़ात ज़रूर हमारी यादों में बसी रहेगी और यह तथ्य भी कि राजदूत महोदय हंगरी की एक चीज़ जिसे वह सब से अधिक मिस करेंगे : पोगाचा है!)