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शनिवार, 1 मई 2010

सल्मान रशदी

विक्टोरिया उरबान--

मैं आजकल सल्मान रशदी की एक किताब पढ़ती हूँ।

मैंने सोचा कि उसके बारे में हिंदी में लिखूँ।

वह क मशहूर लेखक हैं।

जब वह 13 साल के थे, पिता ने पारिवारिक घर बेच दिया।

इससे सल्मान रशदी बहुत नाराज थे, क्योंकि मुंबई से पाकिस्तान जाना पड़ा।

लेखक कुछ दिन वहाँ रहा फिर लंदन में बस गया।

उनकी दूसरी किताब प्रसिद्ध हुई- Midnight’s Children (ठीक आधी रात के बच्चे)

इस कहानी में एक लड़का है जो भारत के विभाजन के क्षण में पैदा हुआ था।

मैं उनकी तीसरी कहानी पढ़ती हूँ, उसका शीर्षक- Shame (शर्म) है।

इस किस्से में एक बड़ा परिवार है, जहाँ यथार्थ और कल्पना का मिश्रण है। मुझे बहुत पसंद है।

उसका अगला उपन्यास ‘कलंक’, क्योंकि मुसलमान नेताओँ ने किताब मना की। यह मुख्य रूप से फारसी (ईरान के) धर्म के खिलाफ है।

लेखक को छिपना पड़ा।

अंत में किसी ने चोट नहीं पहुँचाई।

अब वह न्यूयॉर्क में अपने परिवार के साथ रहता है।

द्वादशः शैक्स्पिरीयः सोनेतः

अनुवाद एव मुद्रा--

वेलावदतीं घटीम्गणयन्, पश्यन्: स्वहं दुर्निशा भवते,

वसन्तान्ते नीलोत्पलं क्षीणम्, नीलालका रौप्याः श्वेतायन्ते,

वृक्षा बृहन्तः विना पर्णानि यूथानां छायादवितानकाः,

ग्रीष्मतृणानि स्तम्बबद्धानि शूकश्मश्रूणि निहित्वा खाटान्।

तव सौन्दर्यस्य भाग्यमीक्षे: जीर्णकाले त्वया त्यजनीयं।

स्वादुता हि, रूपं च जहते मृयते च यथान्यत्प्ररूढम्।

पुत्रकेणैव रक्ष्यसे कालात्-युध्यासे हरतीतो यदा त्वाम्।

छोटा गोलू

(अनुवाद रीता शिमोन, अन्ना शिमोन, रीता डोमिनिक)--

एक बार की बात है, दूध जैसे सागर से भी आगे एक ग़रीब आदमी और औरत रहते थे। उनकी तीन बेटियाँ थीं। उनके पास एक छोटा सुअर भी था। जब उन्होंने सुअर को इतना मोटा कर लिया कि उसकी चर्बी दो उँगली मोटी हो गई, तब उन्होंने सुअर को खाने के लिए मार डाला। इसके बाद उन्होंने गोलू को अटारी में शहतीर से लटका दिया। उन पाँचों के लिए माँस इतना कम था कि जैसे ऊँट के मुँह में जीरा। एक बार ग़रीब औरत को गोलू को खाने की भूख लगी। उसने सबसे बड़ी बेटी से कहा:

-ऊपर, अटारी में जाओ मेरी बेटी, शहतीर गोलू को लाओ हम उसे पकाएँगे।

उसने ऐसा ही किया। वह अटारी में गई। जब वह गोलू को शहतीर से काटना चाहती थी गोलू ने उससे कहा:

-हूँऊ – अब मैं तुझे खाऊँगा। - उसने मज़ाक नहीं किया वह सचमुच ही उसे खा गया। गुड़ुप।

वे सब कुछ देर तक लड़की का इंतज़ार करते रहे कि वह गोलू को लेकर आए। लेकिन वह नहीं लौटी। इसलिए औरत ने बीचवाली बेटी से कहा:

- मेरी बेटी अपनी बहन के पीछे जाओ उससे गोलू को लाने के लिए कहो।

इस पर दूसरी बेटी भी ऊपर जाती है और अटारी में इधर-उधर देखती है लेकिन बड़ी बहन कहीं नहीं दिखती। इस के बाद गोलू उससे कहता है:

- मैं तुम्हारी बहन खा चुका हूँ अब मैं तुझे भी खाऊँगा।

उसी क्षण उसने उसे खा लिया। गुड़ुप।

वहाँ नीचे ग़रीब औरत अपनी दोनों बेटियों का इंतज़ार कर रही थी, जब वह इंतज़ार करते-करते ऊब गई, तो उसने सबसे छोटी बेटी से कहा:

- ऊपर जाओ मेरी बेटी, नीचे अपनी बहनों को बुलाओ वे ईश्वर से डरने के स्थान पर सूखी चेरियाँ बटोरती हैं।

जब छोटी लड़की अटारी में गई, गोलू ने उससे भी कहा:

- तुम्हारी दोनों बहनों को खा लिया अब मैं तुझे भी खाऊँगा।

उसने ऐसा ही किया। गुड़ुप।

औरत समझ नहीं सकी कि लड़कियाँ कहाँ भटक रही हैं। वह लड़कियों को बुलाने के लिए ऊपर पहुँची। लेकिन वह उन्हें धन्यवाद नहीं कहेगी बल्कि उनकी पिटाई करेगी। जब वह ऊपर गई, गोलू ने उससे कहा:

-तुम्हारी तीन बेटियों को खा चुका हूँ, अब मैं तुझे भी खाऊँगा।

उसी क्षण वह उसे ऐसे गुड़ुप गया कि उसकी छोटी उँगली नहीं बची।

इसके बाद ग़रीब आदमी अपनी बेटियों और पत्नी का इंतज़ार कर चुकने के बाद अटारी पर गया। जब वह चिमनी के पास पहुँचा, तब गोलू ने उससे कहा:

-तुम्हारी तीन बेटियों और पत्नी को खा चुका हूँ। हूँऊ अब मैं तुझे भी खाऊँगा।

वह बिलकुल भी नहीं झिझका उसे भी निगल गया, गुड़ुप।

पर उधड़ी हुई सुतली पाँच लोगों के भार को झेल नहीं सकी। वह शहतीर से टूट गई। गोलू गिर गया, फिर खड़ा होने के बाद सीढ़ियों से नीचे ज़मीन की ओर लुढ़कने-पुढ़कने लगा।

फाटक से बाहर निकल कर उसने सड़क पर बहुत सारे लोग देखे। उनके हाथों में घास काटने वाली दराँतियाँ थीं। गोलू ने उन को एक-एक करके खा लिया। गुड़ुप, गुड़ुप, गुड़ुप, गुड़ुप, गुड़ुप।

वह लुढ़क-पुढ़क रहा था। उसने कच्चे रास्ते पर बहुत सैनिक देखे। उसने वे भी खा लिये। गुड़ुप, गुड़ुप, गुड़ुप, गुड़ुप। वह फिर लुढ़क-पुढ़क रहा था।

वहाँ पास ही नाले के तट पर एक लड़का अपने सूअरों को चरा रहा था। सूअर दूर-दूर थे लड़का नाले के किनारे बैठकर अपने चाकू से डबल रोटी और सूअर का माँस काट रहा था। छोटा गोलू उस के पास गया और उसने उससे कहा:

-मैं तीन बेटियों को माता-पिता के साथ, अनेक दराँतियोंवालों को तथा सैनिकों के समूह को खा चुका हूँ, अब मैं तुझे भी खाऊँगा।

जब वह उसको खाना चाहता था, तो लड़के का चाकू उसके मुँह में फँस गया और वह कट गया। बहुत लोग बाहर निकल आये, सैनिक भी और सब लोग भी। कटे हुए गोलू को छोड़कर अपना-अपना सब काम करने लगे।

अगर छोटा गोलू लड़के के चाकू से न कटा होता तो मेरी छोटी कहानी सदा चलती रहती।

घड़ियाल (विभाग के छात्र द्वारा स्वअनूदित मौलिक कहानी)

रॉबर्ट वालोसी--

वह धूप से जाग गय। सुबह की पहली किरण दो भारी परदों के बीच से अंदर दौड़ी और सीधी उसकी आँख पर पड़ी। वह अपने स्वप्न में भी इस किरण का खेल देख रहा था। चमक से ऐसे चल-चित्र देखने के कारण उसका स्वप्न और अधिक स्वप्निल सा हो गया था कि तभी उसे जागना पड़ा।

उसने अपनी आँखें खोलीं।

पहले वह नही समझ पाया कि क्या हुआ। कुछ देर टिमटिमाने के बाद ही उसका दिमाग असली दुनिया में आ पाया।

जगना अजीब है, उसने सोचा, पिछली बार एक किरण ने उसे कब जगाया था ? जब से वह इस मकान में रहता है। यकीनन कभी नहीं। तीन साल पहले ! शायद!

सोने से पहले उसका अंतिम काम परदा ठीक करना होता है। जी, इसकी जरूरत नहीं होती। वे परदे अपने आप कभी नही चलते। फिर क्या हुआ?

जी हाँ, उसने सोचा। उसने कल शाम खिड़की से बाहर देखा था।

खिड़की के पास से कोई आवाज़ आयी थी। खटके सी। दो कबूतर खिड़की की पटरी पर बैठ गए थे। वे इधर-उधर चल रहे थे। कुछ

देर तक वह उन्हें देखता रहा था। वे बिना किसी परेशानी खेल रहे थे। पर दो मिनट के बाद ही पक्षी मैले शहर की ओर उड़ गए।

ऐसा हुआ तो हुआ, उसने सोचा। अगली बार वह सचेत रहेगा। आज, कभी न कभी तो उसे उठना ही था। इससे पहले उसे एक छोटी अलार्म-घड़ी की भिनभिनाहट से जगना ही था। वह उससे घृणा करता था। कल उसने घड़ी को फर्श पर दे मारा। घटिया घड़ी थी। सिर्फ एक घड़ी। उसकी अपनी घड़ी नही। उसने सोचा।...

वह ऐसा काम नहीं करेगा, पर सेल फोन अच्छा रहेगा।

शुक्रवार है..., उसने सोचा। हफ्ते का सबसे सुंदर दिन...। वह काम करने नहीं जाएगा, क्योंकि उसने छुट्टी माँगी थी। अगर छुट्टी नहीं मिलती तो भी घर पर ही रहता।

वह बहाने बनाने में कुशल है..। उसे अभ्यास करने में बार-बार कुछ समय लगाना होता है। यह एक अच्छी कला है, अगर वह घर से नहीं निकलना चाहता। आज वह दुकान तक भी नहीं..., उसने सोचा। महत्वपूर्ण दिन है। इसके लिए उसे महीनों भर लंबे समय तक काम करना पड़ा था।

और पैसा बचाना....। हाँ, पैसा बचाना मुश्किल है, पर इस घड़ियाल के लिए क्या मुश्किल है?

वह अपने आप को समझा नहीं सकता। घड़ियाल अब उसके दिलो दिमाग पर छा गया था। उसने इंटरनेट पर देखा या पहले टी. वी. पर? फर्क नहीं पड़ता। पर महत्वपूर्ण यह है कि उसने घड़ियाल देखा। पहली बार उसे अजीब लगा। नया और पुराना भी। आधुनिक दुनिया में कोई अर्थ नहीं था। एक लोलक वाले घड़ियाल को कौन चाहेगा? जी हाँ, एक बड़े महल के लिए उपयुक्त होगा। पर उसके घर जैसे छोटे से मकान में बहुत हास्यास्पद लगेगा। वह बहुत बड़ा... अलंकृत था। पहली बार...। वह टी.वी. में देखा था, उसने सोचा। क्योंकि उसने उसके बारे में सोचने में थोड़ा भी समय नहीं लगाया। आजकल टी.वी. में ऐसी ही चीजें होती हैं। कोई रोचक होती है, कोई नहीं। उसे पहली बार में ही अजीब लगा था। उस पर सोने की सजावट भी थी। बहुत आडंबरी...।

फिर किसी आलस भरी शाम को उसे इंटरनेट पर भी देखा। तब उसे पहली बार से कुछ अलग लगी। वह उसका अभ्यस्त होने लगा। नहीं, यह शब्द ठीक नहीं है, उसने सोचा, अब यह घड़ियाल उसका है।

सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी वह कभी ऐसी चीज चाहेगा। यह आने-जाने वाली सनक नहीं थी। वह उसकी जरूरत है, उसने सोचा। यह सभी के लिए जरूरी है। शायद लोगों को इसकी नहीं पर किसी चीज की जरूरत है। उसे इसकी ही....।

बहुत महँगा, यह सच है। एक कॉफी या एक सिगरेट की कीमत उसकी नहीं है। हो सकते हैं तीन-चार महीने...। अच्छा, पाँच महीने, उसने सोचा। इतने समय में वह पूरा पैसा जमा कर सकेगा तो फिर परेशानी कम होगी। अभी तक वह इस बात के बारे में आस्था नहीं रखता था कि एक अदना सा बटन दबाने से इन्सान का जीवन बदल सकता है। जैसे एक लाल बटन दबाकर रॉकेट चला दिया जात है। एक छोटी सी हरकत और रॉकेट लक्ष्य की ओर...। लक्ष्य, उसने सोचा। अब एक लक्ष्य उसका भी है। खैर, यह आम बात है। कुछ पाना...। शायद जीवन की सबसे बुनियादी चीज....।

फिर भी कुछ अजीब....।

उसका शौक नहीं था कभी-कभी वह ऐसा-वैसा कुछ काम करता था जिसे वह अपना शौक कहता था। आदमी का कोई शौक होना चाहिए, उसने सोचा। मगर अब तक कुछ किया था, उनमें से किसी में मन नही रमा। शायद कुछ अलग होगा, उसने सोचा। बिल्कुल अलग...। उसका निर्णय है, इसलिए बिल्कुल अलग । पर नींव अच्छी रखनी होगी।

चार महीने बीत चुके थे, ( पाँच नहीं)। इस दौरान वह तैयारी कर रहा था पैसा कमाना इस काम का नीरस हिस्सा था। इसकी कोई बात नहीं। वह हर सुबह उठता था- उस घटिया घड़ी की कर्कश आवाज से, उसने सोचा- तैयार होकर निकल जाता था। घर लौटते ही वह सोचता कि एक और दिन बीत गया। सिर्फ एक काटे का निशान कलेंडर में ऐसे या वैसे, किसी भी ढंग से, मतलब दिन बीत जाने से है।

तैयारी सिर्फ कमरे की चारों दीवारों के बीच में शुरु हुई। वह दिन भर किताब पढ़ता रहता था इंटरनेट पर लेख खोजता रहता। बहुत थे। आश्चर्य की बात है, मगर किसी में भी कोई काम की जानकारी नहीं मिली। उसका कौतुहल समाप्त होने पर नहीं आ रहा था...।

आदर्श आकार-प्रकार कौन सा होगा? किस तरह की लकड़ी से बना होगा वह घड़ियाल? गहरी या उजली? लोलक कितना बड़ा होना चाहिए?किस धातु का सबसे अच्छा रहेगा? सवालों की शृंखला अनंत थी। संभावित उत्तरों की भी। कहीं भी दो समान विचार नहीं मिले। वह चकरा गया था। वह मध्यमार्ग खोज निकालेगा, उसने सोचा। वह इस घड़ियाल से पार पा लेगा। जिसे वह प्यार करता है वह उसे हरा नहीं सकता।

मनपसंद घड़ियाल खोजने में अधिक समय लग रहा था।

चित्र में तो छोटा ही था पर वह अपने मन में पूरा घड़ियाल देख सकता था। उसके कानों में उसके घंटों की आवाज गूँजती रहती थी। उसकी गंभीर आवाज में खिड़की से आता हुआ शनिवारी शोर डूब गया।

शेष हफ्तों में वह हर दिन उस चित्र को देखता रहा। अंतिम मुश्किल थी घड़ियाल का स्थान। सबसे सुंदर कहाँ होगा? क्या वहाँ, जहाँ सभी देख पाएँ, या कोई गुप्त कोना...।

अगर घड़ियाल मकान में आ जाएगा तो वह जान लेगा।

अंतिम दिन बहुत धीरे-धीरे बीत रहे थे। वह सब जानता है, उसने सोचा। जब सिर्फ पैसे का प्रश्न है...। सिर्फ समय का प्रश्न..। सिर्फ धैर्य का प्रश्न...।

चार महीने और पंद्रह दिन हो चुके थे। वह गर्व कर सकता है – उसने सोचा। बहुत जल्दी ही सफल भी हुआ। वह सब चीज़ें छोड़ देता था। सिर्फ़ खाना। कुछ भी नहीं। सिर्फ़ ऐसा हो सकता है – उसने सोचा।

वह प्रसिद्ध क्षण आ गया। उसने आर्डर दिया। जी, वह ख़ुद उसको लाने के लिए जा नहीं सकता था। पर, वे खुद घर पहुँचाएँगे। शुक्रवार अच्छा रहेगा – उसने सोचा। काम से छुट्टी माँगी। हाँ, उसे छुट्टी भी मिल गई। उसका कोई महत्त्व नहीं है – उसने सोचा। उसने अलार्म-घड़ी लेकर फ़र्श पर दे मारी। टुकडे-टुकड़े हो गये उसके। आज से ही यह घटिया घड़ी उसे जगा नहीं पाएगी – उसने सोचा। खुश कबूतर ख़िड़की में खेल रहे थे। एक दूसरे का कंठ पकड़ने की कोशिश में लगे थे। सिर्फ़ खेल रहे थे। शहर अजीब है – उसने सोचा। यहाँ से देख सकता है।

वह धूप से जाग गया। सुबह भी अजीब है – उसने सोचा। पर यह तो अच्छा है। कम से कम वह तो सबसे अलग है।

घड़ियाल शाम को लाया जाएगा। पर तब तक वह क्या करे ? – उसने सोचा। समय बीतना नहीं चाहता था। आज दुकान तक भी नहीं...- उसने सोचा।

खटखट की आवाज़ आई। वह लाया गया है, आ पहुँचा है ! उसने दरवाज़ा खोला। दो मज़दूरों के बीच घड़ियाल खड़ा था। वह उसे नहीं देख सकता था क्योंकि वह काग़ज़ में बँधा था। पर उसका रूपाकार अच्छी तरह से दिखाई देता था। उसने दीवार के पास रखवाया। उसने अभी तक निश्चय नहीं किया था कि घड़ियाल का स्थान कहाँ होगा।

पूरा सप्ताहांत आ रहा है – उसने सोचा – सोचने-समझने के लिए समय मिलेगा। पैकिंग बहुत मज़बूत थी। वह फाड़ डालना चाहता था पर वह नहीं कर पाया था। इससे अधिक आदर देना चाहिए – उसने सोचा। उसने धीरे-धीरे और सावधानी से पैकिंग खोल ली। वह होशियार बन गया कि घड़ियाल पर एक खरोंच भी नहीं आएगी। पहली कटाई के बाद पौकिंग के अंदर से खुशबू आयी। उसके लिए यह गंध काफ़ी नहीं थी। लकड़ी, लाख, और गोंद की बू अद्भूत ढंग से मिली-जुली थी और सारे कमरे में फैली चुकी थी।

धीरे-धीरे घड़ियाल दिखाई देने लगा। बहुत सुंदर था। ओह ! सुंदर नहीं, ’सटीक’ है – उसने सोचा। कुछ देर तक उसमें घड़ियाल छूने की हिम्मत नहीं हुई। पैकिंग के कचरे को घड़ियाल के आसपास से उठाकर फेंक दिया। क्योंकि ऐसी अनोखी वस्तु के पास किसी प्रकार की रद्दी, कचरा अनुचित होगा। वह घड़ियाल के सामने बैठा, यंत्र के हरेक टुकड़े को निहारता रहा। नख से सिर तक। उसकी रंगत बल्ब की रोशनी में रत्न जैसी चमक रही थी। वह अपनी आँखें उससे हटा नहीं सकता था। वह नहीं जानता कि आश्चर्य में डूबे-डूबे कितना समय बीत गया। वह एकाग्र हुआ, उसके आस-पास की सारी दुनिया गायब हो गयी। दोपहर है ? या शाम? – उसने सोचा। शायद वह चला सकता है – उसने सोचा। सूइयाँ उनके सही स्थान पर लाकर चला दीं। वह ऐसा सावधान था जैसे कि घड़ियाल कोई पवित्र चीज़ हो। 7:30 थे। पूरा दिन बीत चुका है – उसने सोचा। पर कोई बात नहीं। उसने लोलक हिला दिया। उसके जीवन का सब से सुंदर क्षण था यह। पिछले महीनों का विरह और आतुर इंतज़ार, अब सब-कुछ अपने स्थान पर था। इस से ऊपर नहीं हो सकता है – उसने सोचा। सचमुच।

दिल की धक-धक जैसी घड़ियाल की आवाज़ उसके कमरे के कोनों में गूँजने लगी। उसके दिल की आवाज़? अंततः वह खुश है – उसने सोचा। ग्यारह बज चुके थे जब वह सोने के बारे में सोचने लगा। घड़ियाल को पलंग के सामने घसीटा। यहाँ ठीक रहेगा आज के लिए। वह जल्दी से पलंग पर लेट गया। बिजली बुझाने से पहले कुछ देर तक उसे निहारता रहा था। आज से सब-कुछ बदल जाएगा। इसका जीवन अलग होगा – उसने सोचा।

वह लोलक का टनटनाना सुन रहा था। टन-टन-टन। सो जाने के लिए अधिक समय ज़रूरी नहीं था।

टन-टन-टन !

वह पलंग में उठ बैठा। शंकित होकर अपने पास रखे हुए फ़ोन को देखा। नींद के सिर्फ़ दस मिनट बीते थे। इस आवाज़ की आदत डालती होगी – उसने सोचा।

वह तो सोने की कोशिश कर रहा था पर घड़ियाल की आवाज़ से उसके मन को अशांत कर रही थी।

टन-टन-टन।

अचानक आवाज़ आनी बंद हो गयी, अंततः – उसने पहले सोचा। उसकी आँखें खुलीं। वह एक क्षण के लिए सुनसान कमरे का अंधेरा देख रहा था। उसने बल्ब के बटन पर हाथ लगाया। रोशनी कमरे में फैलते ही वह घड़ियाल के पास दौड़ा। 11:59 थे और उसका लोलक शांत था। अजीब है – उसने सोचा। लोलक को चला दिया। बोझिल यंत्र चालू हो गया।

यंत्र तो चला पर सूइयाँ एक स्थान अटक गयीं। वे 11:59 पर अटकी थीं।

अब क्या करूँ ? – उसने सोचा। यह क्या हो गया है? कुछ बिगड़ गया है? क्यों उसका घड़ियाल... ?

वह मकान में इधर से उधर घूम रहा था। कभी-कभी घड़ियाल के पास पहुँचता पर उसको छूने की हिम्मत नहीं कर पाया था। शायद दो घंटे बीत गये। वह निराशा में डूब गया था। पर सूइयों का चलना नहीं देख पाया था। अंत में उसने सोचना छोड़ दिया। शायद थकान या विवशता के कारण। उसने सूई को हाथ लगाया और उसे ठीक स्थान पर फिराया। 02:23 – उसने सोचा। क्या शुक्रवार ! क्या रात ! उसने जल्दी तकियों पर अपना सिर वापस रखा और लोलक की आवाज़ सुनने लगा। बाएँ से दाएँ तक। दाएँ से बाएँ तक। उसका पेट काँपने लगा। तथापि वह बहुत थका था। उसकी आँखें में स्वप्न नहीं थे। वह बिजली जलाकर घड़ियाल को देखने लगा। 02:32। ओह, तो यह चलता है – उसने सोचा। वह मुस्कराते हुए सो गया।

इसके बाद दो दिन तक ऐसा ही घटना-क्रम चला। सोमवार वह ऐसा भयभीत हुआ कि उसे काम से घर आना पड़ा। वह किसी की भी आदत नहीं डाल सकता था, उसके दिमाग से सब-कुछ गायब था। वह कुछ भी करता पर घड़ियाल वैसा नहीं चला कि लगे की ठीक है। घड़ियाल उसपर जादू चलाता था, जैसे एक सम्मोहन करनेवाला यंत्र। उस के कारण उसे बहुत डर लगा था कि यंत्र वैसे नहीं चलता जैसा चलना था।

ओह, कितनी रात, उसने उसके बारे में सपना देखा था– उसने सोचा। और अब यह है।

उसने कंपनी को भी फोन किया। पर वे एक दूसरा नया घड़ियाल नहीं देना चाहते थे। एक कारीगर बुलाइए ! – उन्होंने कहा। उसने बुलाया, एक बूढ़ा पर बहुत अनुभवी कारीगर उसके घर आया। इस घड़ियात में कोई त्रुटि नहीं है – उसने कहा। उसकी संरचना ठीक है। पता नहीं क्या है। सब अच्छा दिखाई देता है। दंत-चक्र सुंदर हैं और अपने स्थान पर हैं। संतुलन भी अच्छा है। सूइयाँ नहीं अटकतीं।

वह अब अपने काम की भी उपेक्षा करने लगा। वह हर दिन घड़ियाल के पास खड़ा रहता था, कोशिश करता रहता था। एक टॉर्च से उसके हर हिस्से की परीक्षा करता था। शायद कोई चीज़ मिले जो गलती का कारण हो।

और हाँ, उसने कुछ चीज़ें खोज निकालीं। पर वे गड़बड़ी का स्पष्ट उत्तर नहीं दे सकीं। कई खरोंचें और रंग-रोगन की गलतियाँ, जिन्हें उसने पहली बार में नहीं देखा था। सिर्फ़ गहरी खोजबीन से प्रकट हुआ कि रोग़न भी ठीक नहीं था। कई जगहों पर लाख खुरदरा था या लाख ही नहीं था। शुरू में उसने ऐसी कल्पना नहीं की थी। चित्रों और वर्णनों में ऐसा नहीं दिखता था। क्या हुआ – उसने सोचा – ऐसा उसके साथ ही क्यों होता है ?

बहुत लंबे समय तक देखा स्वप्न था, अब उसके प्रत्यक्ष में खड़ा है : चलता नहीं है और कुरूप भी है।

उसके दिन इसी ढंग से बीतते जाने लगे। चिंता ने उसके मन में डेरा डाल लिया था। उसकी सराहना धीरे-धीरे गुस्से में बदल गयी। इसमें कोई ज़्यादा समय नहीं लगा था। जब उसका हर दिन और हफ़्ता सूइयों को देखने और इंतज़ार करने में बीतने लगा तो उसका मन कुछ टूटा सा गया। उसने दराज़ से एक छुरा निकाला। घड़ियाल को चीर दिया। एक और बार। और एक और बार। वह खुश हुआ। उसने शीशे का दरवाज़ा भी तोड़ दिया।

उसका असली रूप यही है – उसने सोचा।

कुछ दिन बाद कचरे डिब्बे के साथ घड़ियाल को रास्ते के किनारे पर खड़ा कर दिया। लोलक तब भी इधर-उधर झूल रहा था। चारों ओर देखा, घड़ियाल को लतिया दिया। रास्ता बहुत शांत था। सुबह का कोहरा अभी तक शहर के ऊपर ऊड़ रहा था। हवा ताज़ी और सुखकर थी। शहर को पिछली बार कब देखा ? – उसने सोचा। हाँ, जब कबूतर खिड़की में खेल रहे थे। सच है कि वह इस के बाद कई बार काम करने जाता था। पर यह अलग है – उसने सोचा। वह किसी पर ध्यान नहीं देता था, जैसे वह दुनिया में ही नहीं रहता था। लोलक के जैसे। एक ही रास्ते पर हिलता-डुलता था। एक रास्ता जिससे वह बाहर निकल नहीं पाता था। सिर्फ़ इधर से उधर। उधर से इधर। भारों की ऊर्जा से चलने वाला। आवश्यकता की ऊर्जा।

अब देखने का समय आया है – उसने सोचा। वह अपने हाथ जेब में डालकर निकल गया। निरुद्देश्य ! उसने एकबार भी मुड़कर नहीं देखा।

. . .

घंटे बीत रहे थे। एक के बाद दूसरा। 11:59 थे। अचानक सूई आगे बढ़ी। वहीं, रास्ते के किनारे पर। एक नया दिन शुरू हुआ।

सूर्य की अर्चना

हेगेदुश मिकलोश--

हिंदु भक्तजनों के जीवन में सूर्य देव (सूरज देवता) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुख्य रूप से वे जीवन में आते हुए परम प्रकाश हैं। इनके तरह–तरह के रूप वैदिक काल में भी दिखाई देते हैं। ऋग्वेद में सूर्य से संबंधित देवताओं के भिन्न-भिन्न स्तुति –भजन लिखे गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर आदित्य वाले हैं। आदित्य, अदिति देवी से उत्पन्न हुए देवता हैं। इनकी संख्या संहिता और ब्राह्मण वाले पाठों के अनुसार आठ या बारह है। इनमें से हम बहुत प्रसिद्ध वैदिक देवताओं- जैसे मित्र और वरुण आदि को देख सकते हैं। सूर्य भी अदिति का बेटा है, जो ऋग्वेद में नाम से सवितृ (सविता) के रूप में निकलते हैं। ऋगवेद के (10,17) सूर्य देवता के परिवार के बारे में कुछ जानकारियाँ दिखाता है- सूरज का यम वैवस्वत के पिता के रूप में वर्णन किया गया है, जिसे सातवाँ मनु कहा जाता है। हम लोग उनके बेटों में से दो अश्विन (सारथी) को देखते हैं, और मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन, यमी की भी सूर्य से उत्पत्ति की जाती है।

वैदिक परंपरागत देवता त्रय के अनुसार सूर्य आकाश में रहते हैं, अग्नि पृथ्वी में तथा इंद्र अंतरिक्ष में वसन करते हैं। सूर्य के लक्षण के बारे में ऋगवेद (1,35) का एक बहुत उल्लेखनीय पद यह है-“हिरण्येन सविता रथना देवो याति भुवनानि पश्यन” इसका मतलब यह है कि सूरज का देवता सोने वाले रथ पर पहुँचाया जाता है, जो लौकिक जीवन को देखते हैं और उनकी देखभाल करते हैं। सूर्य मंदिरों में देवता का वर्णन प्रायः ऐसा ही है कि वे एक सात घोड़ों वाले (या सात सिर वाले घोड़े वाले) रथ पर चलते हैं, जो अरुण (उदय) द्वारा चलाया जाता है। अरुण सूर्य का मुख्य सारथी है, इसलिए इनको रविसारथी भी कहते हैं। मूर्तियों में सामान्य रूप से पैर के बिना है। सूर्य का वर्णन मंदिरों के गर्भगृहों में दो या चार हाथवाली मूर्तियों के रूप में किया जाता है। एक ओर उनके हाथों में एक-एक कमल दिखाई देता है, दूसरी ओर उनके चार हाथों में एक कमल, एक चक्र, एक शंख और एक हाथ अभय मुद्रा में है।

सूर्य नव ग्रहों में से सबसे महत्वपूर्ण व ग्रहों का नेता है। इस दर्शन के अनुसार ज्योतिशास्त्र की तरह-तरह की कृतियों में सूर्य का माहात्म्य विस्तार से लिखा गया है। आम तौर से रविवार को सूर्य की पूजा की जाती है, क्योंकि यह दिन देवता का निजी दिन है। इसलिए रविवार या भानुवार भी कहलाता है। सूरज की अर्चना महाकाव्यों और पुराणों में भी देख सकते हैं। रामायण में सूर्य किष्किंधा कांड के वानर राज, सुग्रीव का पिता है, जिन्होंने रावण को पराजित करने के लिए राम और लक्ष्मण की मदद की। राम सूर्यवंश के राजाओं में सबसे प्रसिद्ध वीर हैं। महाभारत में सूर्य कर्ण का पिता है, जो उनकी माता कुंति से दैवी उद्गम से कारण दूर हो जाता है, लेकिन कहानी के क्रम में कर्ण को लड़ाई करने में सूर्य से पैतृक सहायता मिलती है।

भारतीय वंशों में सबसे प्रसिद्ध सूर्य और चंद्रवंश हैं, सूर्यवंश के राजाओं का सिलसिला कालिदास के रघुवंश में भी दिखाई देता है। सूर्यवंश मगध का विकास होने से पहले सबसे बड़ा और मंगल कुटुंब था, जिसकी राजधानी अयोध्या, वैवस्वत मनु (अर्थात् सूर्य के बेटे) द्वारा संस्थापित की गई है।

सूर्य की उपासना हिंदु भक्तजनों के जीवन-भर का सजीव, महत्वपूर्ण धार्मिक उपचार है। इस देवता की ध्यान और पूजा करने की भिन्न-भिन्न धार्मिक और सामाजिक विधियों की चर्चा की गई है। सबसे मशहूर गायत्री या सावित्री मंत्र के रूप में है, जो ऋगवेद (3,62) में सूर्य की स्तुति के रूप में दिखाई देता है। यह मंत्र सब दिन सूर्योदय और सूर्यास्त में गाया जाता है।

हिंदु समाज ने सूर्य की अर्चना संस्कारों के सिलसिले में बनाई थी, सबसे पहले सूर्यदर्शन के अनुसार चार महीनेवाले बच्चे को घर से बाहर पहली बार सूर्य के दर्शन करने के लिए ले जाया जाता है। इस विधि का दूसरा नाम ‘आदित्यदर्शन’ भी है। गायत्री मंत्र का बड़ा महत्व उपनयन संस्कार में भी है। सूर्य की अर्चना करने के बाद, गायत्री मंत्र का उच्चारण करके और अंत में यज्ञोपवीत पाने के बाद हिंदु लोग अपनी दूसरी उत्पत्ति और वेद पढ़ने के लिए उपनयन प्राप्त करते हैं।

भारत की सब दिशाओं में तरह-तरह के सुंदर मंदिर बने हुए हैं। इनमें से स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण मंदिर कोणार्क (उड़ीसा), मोधेर (गुजरात) में हैं। कोणार्क में मंदिर की इमारत सूर्य का सज्जित रथ है, जो बारह खूबसूरत पहियों पर गुजरता है। नवग्रहों की अर्चना के लिए असम वाले गुवाहाटी में, दक्षिण में कुंभकोणम के आसपास भिन्न मंदिर बनाए गए हैं।

हम लोग देखते हैं कि सूर्य की अर्चना ऋगवेद के काल से आज तक भी हिंदु समाज में एक अटूट सजीव परंपरा है।

बाईबल की एक कहानी, नोआह का बड़ा जहाज़ का अनुवाद

रिता जुलि शिमोन--

यह कहानी पहले समय मैं हुई जब दुनिया युवन थी लेकिन मानव जाति बहुत अधर्मी चीज़ें करते हुए दोष मैं खो गये। ईश्वर लोगों के दिल मैं देखकर बिलकुल नाराज़ या उदास हो गये। उन्होंने सोचा कि उनको दुनिया किसी प्रकार से साफ़ करना चाहिए। उस समय एक अच्छा या ईमानदार आदमी था जो ईश्वर से प्रेम करता था और उनकी नौकरी करता था। नाम नोआह था। एक दिम ईश्वर ने उस से कहा : तुम अपने परिवार के लिए एक बड़ा जहाज़ का स्थापति करना। मैंने निश्चय किया कि मैं पृथ्वी का सभी लोगों को ज्वार से मार दूँगा।

नोआह ने ईश्वर का हुकम माना। जब नोआह अपने काम से तैयार हो गया तो ईश्वर ने उस से कहा कि वह हर तरह जानवर से एक-एक जोड़ा अपने साथ ले। बड़े और छोटे जानवर जमा करने के बाद सब किसी ने बोरड चढ़े हुए मेह पड़ने लगा। सब जीवन वाली चीज़ें मर गयी क्योंकि पानी चालीस दिनों तक पड़ रहा था और उस ने सब कुछ डुबाया। लोग और जानवर जहाज़ मैं महिने इंतज़ार कर रहे थे। वे दिन से दिन अधिक उत्सुक हो गये और खाना भी कम था। नोआह ने एक काग छोड़ दिया। उस ने सोचा कि शायद पृथ्वी मैं कोई सूखा भाग हो। काग लापस आया मतलब पानी अभी भी अधिक था। उस के बाद उस ने एक कबूतर जा दिया और वह भी लौटा। यह एक और बार हुआ लेकिन अब कबूतर एक जलपाई पत्र लाकर वापस आया। उस से जहाज़ के लोगों को पता चला कि पानी अलोप होने वाला हैं। कुछ सपताह के बाद उन्होंने जहाज़ का दरवाज़ा खोला और वे बाहर आये। फिर ईश्वर ने नोआह से कहा: तुम्हारा परिवार और सब जानवर पैदा करें। यह पृथ्वी तुम्हारी और तुम्हारी सन्तान की है। उस के बाद नोआह ने ईश्वार के लिए किसी जानवर की कुर्बनी दी। इस क्रिया देखकर ईश्वार ने कहा: मैं मानव जाती के अंधेर के कारण पृथ्वी इस के बाद कभी नहीं मार डालूँगा। मैं जानता हूँ कि पुरुष बचपन से बुरी बातें कर्ना कोलम है। इस दोष के कारण ज़िनदगी नहीं रुखेगी। ईश्वार ने उन्हें आशीर्वाद दिया और बोला: दुनिया अपने बच्चों से भरना और खुश रहना। और वे कृतज्ञ थे और उनकी नैकरी ज्यादा उत्साह से करते थे। यह एक बुनियादी और महत्त्व्पूर्ण कहानी थी जो ईसाई और यहूदी लोगों के जीवन मैं लोकप्रिय है।