बुधवार, 14 अप्रैल 2010

रिपोर्ट

-- डॉ. चनाद अंतल

आजकल हंगेरियन लोग भारत में दिलचस्पी लेते हैं। लेकिन जैसे ही भारतीयों के लिए युरोप में कुछ भी बताना कठिन है, यहाँ के लोगों को भी भारत के बारे में बातचीत करनी बहुत मुश्किल है।
मैं इन साढ़े महीनों के बाद भी थोड़े-थोड़े समझ सकता हूँ। प्रश्न अब भी ज्ञान से ज्यादा है।
भारत में मैंने संस्कृतियों की लड़ाई नहीं देखी। मैंने कुटुब मिनार देखी जो दुनिया की सबसे ऊँची मुसलमान इमारत है, और वह संसार के सबसे बड़े हिंदू देश की राजदानी में उपस्थित है।
दिल्ली, जैसालमेर, देहरदून, जैयपूर, उदइपुर वाले लोग ज्ञानी और मददकर थे। अहमदाबाद के विद्यार्थी आग्रा के लोगों से ज्यादा समझदार थे। इन सब शिष्यों में देश का प्रेम था, इसलिए वे स्वाभिमानी भी थे। इधर के लोग ज्यादा शुद्ध हिंदी बोलने वाले होने लगे थे। इन लोगों को अच्छा लगा कि हमने हिंदी में बातचीत की कोशिश की।
हमने अनेक ऐतिहासिक या धार्मिक स्थान देथे तथा ऋषिकेश कजुराहो, जुनगढ़, ओरछ, जहाँ सब लोग काफी शांत और ईमानदार थे। छात्रावास में पता नहीं क्यों स्वदेशी विद्यार्तियों से बात-चीत करनी मना था। फिर भी सिक्किम और मिज़ोरम वालों से मिला था। इन लोगों की मातृभाष हिंदी नहीं, फिर भी उन्को बहुत अच्छा लगा कि हम हिंदी बोलने वाले थे।
पर सारे उत्तर प्रादेश में सब लोग हमें देखकर हमेशा सिर्फ अंग्रेज़ी पढ़ने चाहते थे। उनके भारत की संस्कृति के बारे में बहुत कम ज्ञान था। अगरा के अध्यापकों को दुसरी भाषाओं- न स्वदेशी, न ही विदेशी – के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
कहते हैं कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है। पर भारत में अकेली यात्रा करना काफी सरल है।
समुद्र के किनारे पर या पर्वत के जंगल में होटलों से दूर सोकर में भी कोई समस्या नहीं थी। किसी से डर होना नहीं पड़ा। सिक्किम में दो दोस्तों के साथ पहाड़ के नीछे जाने चाहें। दोस्त के गाँव नज़दीक था। और साभी को संक्षिप्ततर की मालुम होने के कारण हमने गाड़ी वाली रास्ता नहीं पाया। कदम-कदम रखकर बहुत खेत होते हुए एक सैनिक केम्प तक आयें। उस्में रहने वाले सिपाही आसामी वाले थे। जिंको न हिंदी न नेपाली आयी थी। मैं सोच रहा था कि क्या होगा। कुछ भी नहीं। वहाँ आर-पार जाकर घर पहूँचे।
महाराष्ट्र में कुछ समस्य हुआ, क्योंकि वहाँ रहनेवालों को कम हिंदी आती है। मैंने सोचा कि हिंदी इसलिए उतना उपयोगी नहीं। लेकिं मेरे दोस्तों में से एक लड़का जो श्रीलंक से आया था, उसने मराठी पढ़ने को शुरु की, और उसने दिखाया कि हिंदी बोलने वालों को दुसरी भाषा सीखना कितनी सरल है।
नेपाली भाषा समानरूप थी। यद्यपि काठमांडौ में ज्यादा लोगों को हिंदी भी आयी थी, मैंने ज्यादातर नेपाली में बात-चीत करनी की कोशिश की।
मैंने पता चला कि हिनदू संस्कृति हिमालय के अत्यंत संबंधित है। मुझे सबसे दिलचस्प पहाड़ के संकृतियों का भेंट लगी। ऐसे नेपाली क्रांति के तर्क, और उसका परिणाम को पता चलना भी बहुत दिलचस्प हों। कभी-कभी नेपाल की स्थिति हंगेरी की स्थिति के सामान होने लगा है, क्योंकी यहाँ भी मुसलमानों के आक्रमण हेतु हमारी संस्कृति पहाड़ों में सुरक्षित हुई थी। मैंने पढ़ा, कि वहाँ के जनाजातिय की इच्छा हैः नेपाली संविधान बदलना, हिंदू वाले के बदले सम्यवादी वाला बनाकर।
इंटेर्नेट में पढ़ा कि भारत का संविधान बहुत सी विदेशी संविधानों से एकत्रित किया था। मैंने हिंदी में नहीं पढ़ा- क्योंकी समझने की ज्ञान काफ़ी नहिं- लेकिन मालुम है कि भारत का धर्म मानु की स्मृति में संविधान की तरह लिखा हुआ था। धर्म विधी के ऊपर था। धर्म लोग पालन करते हैं, विधि को उतना अच्छी तरह नहिं। धर्म संविधान से प्रभावशाली है, क्योंकि युरोपवालों ने माना जाता है, कि हमने बनाये हुए चीज़ो को प्रयुक्त करके में कठिनाई होकर हमको न चीजों को बदलना, मरम्मत करना चाहिए। पर कुछ चीजों को अनादि होना चाहिए।
भारतिय विधि की भाषा बहुत पुरानी लगी है। जिन शब्द अंग्रेज़ी में 2-3 शब्द में प्रकट कर जाते हैं, या लेटिन भाषा से लिए हुए हैं। सो हिंदी में संस्कृति वाले होगें।
Rene David ने लीखा था कि विधि पुराने समय में भी भारत के शासन में महत्वपूर्ण थी।
मानु की अनूदित स्मृति पढ़कर मैंने भी देखा कि दीवानी, फ़ौजदारी और राजनितिक कानून एक साथ ही हैं, क्योंकी तब भारत में यह मानव के व्यवहार से संबंधित थी।
अंग्रेजों ने संहिताएँ प्रस्तुत कीं जिनमें कानून की शाखाएँ अलग-अलग –नियंत्रित हुईँ ऐसे लगता है, कि आजकल विधि (रेलवे की तरह) अंग्रेज़ी आविष्कार है।
विधि का आदेश प्रशासन का हिस्सा है, इसलिए धर्म और रीति सं अनादित नहीं हो सकता है।
योरोप में अपराध इतना बड़ा है, क्योंकि यहाँ सब लोग कानून के द्वारा बराबर होना मना जाते हैं। व्यक्तियाँ यहाँ भी बिल्कुल अलग-अलग हैंस लेकिं उनके संहिताओँ में लिखते हुए कर्तव्य बहुत ही समान्रूप हैं। आजकल यहाँ पर भी छोते जगह में बहुत भीड़ रहती है, और वे लोग बहुत ही भिन्न के लोग हैं। युरोप के देशों की इच्छा एकता होती आजकल से संविधानों में सब मूल अधिकार लीखे हुए है। युरोप के संविधान में मानधिकारों में आधारित हैं। व्यक्ति अलग-अलग रहने लगते हैं। कन्वेंशन में देशों का धर्म (कर्तव्य) के बिना असंभव है। कर्मबुमि होकर युरोप भी अहिंसा की मदद से बड़ा देश हो सकता है।
इस काम करने के लिए भारत की पुरानी विधि को पढ़नी चाहिए जिसे वैध शब्द समान्रूप होने लगते हैं।
भारत मे सब जानवर मित्रवत होते हैं। जो चिड़ियाँ थी सो सिर्फ़ ठंडे मौसम में उत्तर वाले देशों से आती हैं। विदेशों में शिकार किया जाता है, इसलिए वहाँ पुरुषों को देखकर उनको डर लगता है।
कन्वेंशन के सब देशों के विभिन्न रितियाँ होने के होते हुए भी Convention on Conservation of Biological Diversity ( Rio De Janerio 1992) सब देशों के लिए एक ही संधि का पाठ आबद्धकर है। मैंने इस विषय में निबंध लिखा कि हंगेरी में वन एवं जान्वरों का बचाव विधि में कैसे व्यवस्थित किया था, और इसके बारे में मैंने एक शोध किया। इसलिए मुझे दिलचस्प है कि भारत में एक ही संधि कैसे प्रयोग किया जाता है।
युरोप में बहुत वर्षों से जांवरो का बचाव को विधि के द्वारा नींव रखी जाती है। भारत में इसको धर्म से किया जाने लगता है। Phd के लिए इस विषय में हिंदी और नेपाली में भी शोधकार्य करना चाहेगा। धुरभाग्य से उत्तर प्रदेश में होकर बहुत कठिनाईयाँ होती थीं। इसलिए हिंदी भाषा मैंने सिर्फ थोड़ी पढ़ी।
संस्थान के गुरुजी काफी संतोषी थे, लेकिं अपने मातृभाषा विदेशी छात्रों को पढ़ाई में प्रणाली बहुत कम थीं। अंत में बहुत पाठ नहीं मनाये हुए।
फिर भी यह पढ़ाई बहुत उपयोगी थी, क्योंकी मेरी पीएच-डी शोधकार्य विधिक प्रतिरोपण से संबंधित है।
मैंने विश्विद्यालय में दो बार प्रस्तुति की, और अनेक परिसंवादों में इस विषय के बारे में भाषण की।
मैंने भारत और नेपाल में एक अलग संस्कृति, और युरोप का सबसे पुराना इतिहास देखा।
इसलिए में सब लोगों को आभारी हूँ, बहुत धन्यवाद।
(एक विदेशी की हिंदी देखें, इसमें संशोधन नहीं किया गया है।- संपादक)

1 टिप्पणी:

  1. अपने अनुभवों का बहुत अच्छे से वर्णन किया है..और हिन्दी भी बहुत अच्छी है......."

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